Sunday, May 29, 2011

धन्यवाद् कह दूं तुम्हे मैं

जोर भी है मेरे पांव में - कहाँ जान पाया लाश की नक़ल उतारने में
और जीने की चाह करते करते भूल गया की - मैं जीवित हूँ
जाने किसकी नसीहत थी
या ज़द्दोज़हद में बहने की होर
थी शायद दूसरों की नज़र से खुद को पढने की भूल.
लाश हूँ, लेकिन खून गर्म है मेरा
लाश हूँ, लेकिन खून गर्म है मेरा
कमबख्त इतना गर्म भी नहीं की उबाल जाये
और फूट पड़े नशों से .
जो जान पाऊं -उत्तकों में बसे काबिलियत को अपनी
तो बनाने वाले -धन्यवाद् कह दूं तुम्हे मैं .

3 comments:

arti said...

achhi panktiyan hai,kuch panktiya mere liye likhiyega?

arti said...
This comment has been removed by the author.
Vivek Srivastava said...

dard hai tere me....rosh lekin hai baki

thakan hai ...lekin kuchh kar gujarne ki josh hai baki

duniya be dard hai ..beparvah hai..be hosh hai ..lekin kuchh logo ke hosh abhi bhi hain baki..

Lage raho dost .. dil ko jinda rakho ...