Friday, February 28, 2014

मेढकों से भरा एक कंटेनर

कल ऑफिस जाते वक़्त असाधारण कुछ हुआ नहीं लेकिन जाने क्यों एक लघुकथा याद करने का तुक  मिल गया।
मोटरसाइकिल पर ऑफिस या यहाँ वहाँ जाना जैसे नियति है मेरी। कई दोस्त या सहपाठी या सहकर्मी अब तक कम से कम मारुती ८०० तो जरुर खरीद लिए हैं।  मेरी जिंदगी में कुछ ऐसे अवसर आते रहते हैं कि बस ले नहीं पाता हूँ। काफी कचोटता भी है मन जब ३ साल के बेटे को मोटरसाइकिल के आगे बिठा का कहीं ले जाता हूँ और गंतव्य स्थान पर उतर कर जब बेटा अपनी आँखे मलता है। खैर यह सोच का मन को संतावना देता रहता हूँ कि सब चांदी कि चम्मच लिए पैदा नहीं होते और मेरे दिन भी बदलेंगे।  हालाँकि अब तक कुछ इसके आसार दिखे नहीं हैं।
उम्र के तीसरे दशक में हूँ और अक्सर मन से कहता रहता हूँ कि मैं परिपक्व हो चुका हूँ और अर्ध वयस्कता वाली हरकते अब मुझे शोभा नहीं देगी या मुझे करना नहीं चाहिए। फिर भी गाहे बगाहे कुछ कर ही देता  हूँ।
जब हम मोटरसाइकिल खरीदते हैं तो यह यूजर मैन्युअल में यह पढ़ते हैं कि चलाते समय स्पीड को सामानांतर रखना ईंधन कि उपयोगिता को बढ़ाता है।  यही सोच कर मैं अपनी स्पीड को ४५-५० के बीच में ही रखता हूँ। कल एक महानुभाव ने मेरे करीब से अपनी मोटरसाइकिल निकाल दी।  मानो मुझे चुनौती देता हुआ आगे बढ़ा हो।  भला मैं ऐसे अवसर में कब पीछे  हटने वाला। मैंने भी अपनी दाहिने हथेली का ज़ोर नीचे कि दिशा में बढ़ाना शुरू किया।  लेकिन यह क्या। मुझे चुनौती देने वाला शक्श आड़ी-तिरछी चाल चलने लगा ताकि मैं उससे आगे न निकल पाउँ। पीछे से आती हुई एक बड़ी गाडी ने हमारी इस अनकही प्रतिस्पर्धा को ख़त्म किया। मैं उससे आगे बढ़ा ही था कि उसका मोड़ आ गया और उसने कोई और राह पकड़ी। और मैं फिर से यूजर मैन्युअल को याद करता हुआ अपने ऑफिस कि तरफ अग्रसर हुआ।
हालांकि यह कमो-बेश  हर रोज़ कि कहानी है पर आज एक लघुकथा का स्मरण हो गया।
ऐसा माना जाता है कि चीन वाले मेढक का मांस खाते हैं. भारत से मेढकों से भरा एक कंटेनर जल जहाज से चीन कि ओर जा रहा था। चीन के बन्दरगाह पर जब जहाज पहुंचा और परेषिती ने माल जांच करने के इरादे से कंटेनर को ऊपर से झांका तो पाया कि कंटेनर का ढक्कन खुला हुआ हैं। उसने तुरंत ही भारत, अपने प्रेषक को, फ़ोन लगाया और पूछा कि ढक्कन खुला क्यों रखा। प्रेषक से खेद जताते हुए यह कहा कि "जनाब ये भारत के मेढक हैं अगर कोई भागने कि
कोशिश भी कर रहा होगा तो दूसरा उसकी टांग खीच रहा होगा और इस तरह मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कोई नहीं भागा (या समुद्र में कूदा होगा  होगा।  पावक का मन नहीं माना और उसने गिनती करी शुरू कर दी और पाया कि सही मायने में एक भी मेढक भाग नहीं पाया।
यह कहानी सुनने में काफी साधारण सी लगती है लेकिन यह भारतियों कि विस्तृत मानसिकता का परिचय देती है। भले ही हम अपनी झूठी गौरव का हवाला देते हुए इसे झुठला दें लेकिन करीब करीब हर एक व्यवसायी या नौकरी पेशा इस तरह कि अनुभव से कम से कम एक बार तो वाकिफ होता ही हैं।(मैं ऐसा कदापि नहीं कह रहा कि दुसरे देशों में लोग ऐसा नहीं करते होंगे)

(साभार : कहीं किसी ब्लॉग में पढ़ा था, कहाँ याद नहीं )
२८ फरबरी २०१४

Wednesday, February 26, 2014

स्वैच्छिक निष्क्रिय इच्छामृत्यु

कई लोग अपनी ज़िन्दगी में रोज़ मरते हैं। लेकिन उनमे इतनी या तो इच्छाशक्ति नहीं होती है कि अपनी जान खुद ले सकें या शारीरिक रूप से इतनी अक्षम होते हैं कि ऐसा कर नहीं सकते। मूल रूप में देंखें तो तीन तरह के ऐसे लोग होते हैं पहला - बेहद बोझिल, वेदना से पूर्ण,  इच्छाशक्ति के निम्नतर सतह पर लेकिन किसी तरह जिंदगी कि नाव खेते लोग। ये यह चाहते हैं या तो भूकम्प आ जाये या जिस रेल से ये चलें वो उलट जाये या ऐसा ही कुछ हो जाये जब इन्हे पता न चले और ये रेलमपेल कि ज़िन्दगी से निकल मोक्ष पा सकें। लेकिन ये खुद से आत्महत्या नहीं कर सकते। दुसरे वो लोग हैं जो पहली वाली श्रेणी में आंशिक रूप हैं इच्छाशक्ति भी है लेकिन पारिवारिक दवाब इतनी है कि कुछ नहीं कर सकते और जिंदगी को जैसी है वैसी जी रहे हैं।  तीसरे वो लोग हैं जिन्हे जीने के लिए कुछ बचा नहीं है।  जो दूसरों पर बोझ हैं। और इस वजह से खुद से आहात भी हैं अंततः मरना चाहते हैं लेकिन उनके सगे उन्हें मरने नहीं देते। जबकि उनकी शारीरिक पीड़ा इतनी है कि जीने को कोई तमन्ना शेष नहीं।
इस तीसरे किस्म के लोगो के लिए है "स्वैच्छिक निष्क्रिय इच्छामृत्यु"। यानि "एक व्यक्ति के स्पष्ट अनुरोध पर किसी अन्य के द्वारा जीवन की जानबूझकर समाप्ति कि इच्छा" हमने राईट टू एडुकेशन, राईट टू हेल्थ, राईट टू जस्टिस इत्यादि सुना है लेकिन राईट टू डेथ के बारे में कभी सोचा नहीं। 
वे जिनकी जिंदगी उनके खुद के लिए मौत से भी बदतर, जो मौत को गले लगाने के लिए बेचैन, और जिनकी जिंदगी किसी और के लिए मानसिक/आर्थिक पीड़ा पहुचने वाली हो को भला क्यों नहीं उनकी इच्छा के अधीन कर दिया जाये। व्यवहारिक होकर न सोचें तो अमानवीय लगता है। 
मेरे विचार से यह उनके चाहने वालों के लिए भी बेहतर उपाय है जो रोज़ ऊन्हे कराहते सुनते या देखते हैं। 
आज सर्वोच्च न्यायालय ने इसको क़ानूनी बनाने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए वक़्त माँगा। जाहिर है ऐसी किसी याचिका पर किसी तरह के हाँ या ना तरह के आदेश का सुना पाना उनके लिए काफी मुस्किल है। 
क्यों ना न्यायालयही ऐसी किसी कमिटी का गठन करे जिसने तमाम तरह के शिक्षाविद, सामाजिक/धार्मिक प्रतिनिधि, वकील, मानवाधिकार संस्था से जुड़े लोग हों और एक उच्चस्तरीय वार्तालाप हो। 
जिस तरह कि जिंदगी के तरफ हम दिन प्रतिदिन बढ़ रहे हैं इस तरह के मरीजों कि संख्या के बढ़ने कि ही सम्भावना है। स्वाथ्य संस्थानों के सेवाओं कि बढ़ती कीमतें, बढ़ता प्रदुषण, कृत्रिम जिंदगी कि बढ़ती लालसा ऐसी बाते हैं जो हमारे लक्ष्यों में शुमार हो चुके हैं। 
वे जिनकी भगवान् सुनना बंद कर दें, डॉक्टर जहां असहाय हो उनके बारे में कुछ तो सोचना ही होगा। 

Wednesday, February 19, 2014

अच्छा हो हम इस सवाल को सवाल ही रहने दें।

अक्सर देखा गया है लोग केवल अपने ही धर्म को बेहतर समझते हैं। दुसरे धर्म को बराबर या अच्छा नहीं बल्कि निहायत ही घटिया समझते हैं। ये हमारा अतिरिक्त मिथ्या स्वयं के अतिचतुर या अतिविशिष्ट होने का घमंड ही है जो हमें दूसरों के धर्म में नीचा दिखाने के लिए प्रेरित करता रहता है। भला ऐसी क्या बात है किसी के धर्म में जो  उसे दुसरे धर्म को मानने वाले लोगो के प्रति घृणा पैदा करता है। जितना मुझे अब तक अनुभव या ज्ञान प्राप्त हुआ है उसके अनुसार कोई भी धर्म हिंसा या घृणा नहीं सिखाता है। फिर भला अपने धर्म को दूसरों को मनवाने कि इतनी चाह क्यों।
चलिए एक छोटा सा सवाल हम खुद से करते हैं। अगर "X" हिंदू है और वो दिन भर मुस्लिम के अल्लाह को या ईसाई के ईसू मसीह को गाली देता रहता है या वो सूअर का मांस खाता है।  उसे कुछ भी नहीं होता है।
"Y" मुस्लिम है वह दिन भर हिंदुओं के विभिन्न भगवान को और ईसाई के ईसू मसीह को गाली देता रहता है या बैल का मांस खाता है।  उसे कुछ भी नहीं होता है।
"Z" ईसाई है वह सदैव हिंदू, मुस्लिम के मान्यताओं पर हँसता रहता है अपशब्द कहता है या सुअर या बैल का मांस खाता है उसे भी कुछ नहीं होता है।
यानि कि एक भगवान का दुसरे भगवान से किसी प्रकार का संवाद नहीं होता है या "Y" "X" के भक्तों का बाल बांका नहीं कर सकता है।  उसी प्रकार "Z" "Y" के भक्तों का बाल बांका नहीं कर सकता है। सुनने में काफी अज़ीब लगता है ना?
सारे धर्मग्रन्थ यह कहते हैं कि भगवान एक ही है। हमारा यह सवाल इस तथ्य को तो गलत साबित कर रहा है।
या हम यह भी मान सकते हैं कि भगवान है ही नहीं और हम किसी प्रकार के मिथ्या सिद्धांतों के सहारे जी रहे हैं।
अच्छा  हो हम इस सवाल को सवाल ही रहने दें।
अब, सारे भगवान एक हैं इस तथ्य पर भी थोडा गौर करते हैं। इस एक-भगवान प्यार नाम के एक चीज़ का निर्माण किया। यह कम से कम हर धर्म में माना जाता है।  एक हिन्दू लड़के को मुस्लिम लड़की से प्यार हो जाता है या एक ईसाई लड़के को हिन्दू लड़की से प्यार हो जाता है।  ये लोग भी बचपन से  अपने अपने धर्मो के रूढीवादों को देखते आते हैं।  लेकिन प्यार हो जाने के बाद जैसे हर एक कर्म काण्ड मित्थ्या लगने लगती है।  क्यों ? दिल में किसी के प्रति प्यार का भर जाना को किसी एक प्रक्रिया के तहत ही होता होगा। अगर यह माने कि इस अनुभूति को भगवान अपने भक्तों के सृजन के वक़्त उसके ज़िस्म में डालते हैं तो विभिन्न जीवों में या अनुभूति एक जैसी क्यों ? कहीं इस अनुभूति वाला रसायन किसी एक ने ही तो नहीं बनाया। कहीं सारे भगवान एक तो नहीं ?
अगर एक नहीं तो सबके ज़िस्म के खून का रंग लाल ही क्यों ? मुस्लिम का नीला, हिन्दू का पीला और ईसाई का गुलाबी क्यों नहीं?
और अगर एक ही है तो किसी के मन में सबके लिए प्यार और किसी के मन में दूसरों के खून पिने कि इच्छा क्यों ?
गुत्थियों में गुत्थी और जलेबी सी उलझन। अच्छा हो हम इस सवाल को सवाल ही रहने दें।


(यहाँ जिन तथ्यों का विवरण है उसकी प्रेरणा एक अंग्रेजी फ़िल्म "The Vertical Limit" से ली गयी है )



Sunday, February 16, 2014

Hue and Cry on Natural Gas Pricing



There is lots of hue and cry on natural gas pricing these days -
If we try to understand it in simple terms, and forget Rangarajan Committee and their nuances for a while - without prejudice, India shouldn't pay International price for gases from its own Oil wells. Reliance is given the contract for getting gas out of oil wells and processing it.
When India pays 12$ per mmBtu or so to foreign gas suppliers, it actually pays for the "gas". This means this 12$ for them is Gas Cost price + Processing cost + Their Profit::Per unit. The same doesn't hold true for Reliance. Gas is of Govt not Reliance's, and they are only supposed to be paid for the processing cost plus their profit, not the international price that Rangarajan committee recommends. Paying International price to Reliance would only mean that Reliance is the owner of gas, which they are not. Processing fee for Reliance, according to their own submission, is just $1 per unit. One can't be given 700% profit.
If India needs to pay international price for gas from its own wells then what is the point in owning them.
It is like I want a well in my field(for water) and I give a well digger the contract but the digger starts charging me for the water including its labor charge.
C Rangarajan is not God that whatever his team suggest should be the final word.
 

Thursday, February 13, 2014

मेरा मत, मेरा दिल


हम आये दिन अपने नेताओं कि  बुराई करते रहते हैं।  जो मर्ज़ी वो कहते हैं।  लकीर के उस तरफ से दूसरी तरफ के बारे को कुछ भी कहना  हर वक़्त आसान होता है।  आज मुझे कबीर  जी का दोहा याद आ रहा है -

बुरा जो देखना मैं चला, बुरा ना मिलिया कोई।
जो दिल ढूंढा अपना , मुझ  सा बुरा न कोई।।

यह् हमारी पुरानी आदत है, सदैव दूसरों में अवगुण  ढूंढना।  हम कभी अपनी करणी नहीं देखते।  कभी नहीं सोचते आज जो  हम  कर रहे हैं  इसका  दूरगामी  असर क्या होगा।

अक्सर मैंने  अपने दोस्तों को , अपने पड़ोसियों को हर तरह के चुनाओ से पहले प्रत्याशियों  के बारे में बाते करते सुना है।  उन चर्चाओं में कभी भी किसी व्यक्ति के चरित्र या उसके पिछली आचरण को या उसके क्षमता के बारे में बात नहीं करते हैं।  अक्सर उसके आने या ना आने से हमारा क्या फायदा होगा ये सोचते हैं वो किस जाति का वो किस धर्म का है उससे हमारे कितने घनिष्ट सम्बन्ध है इस बारे में बातें होती हैं।

आज  कल सदन में बढ़ती सांसदों द्वारा कि जाने वाली  असवैधानिक व्यवहारों का बढ़ता चलन इस बात को साफ़ इंगित  करता है कि हम मतदाताओं का बौद्धिक स्तर सोच से परे गिर गया है।

क्या ऐसा कहा जा सकता है कि  शिक्षा कि कमी इसका कारण है।  आप कह सकते हैं हां। लेकिन मैं इसे कुछ हद तक ही कारक मानूंगा। मैं अपनी इस दलील को सिद्ध करने के लिए एक वाक्या पेश करता हूँ।

तब मैं पटना साईंस कॉलेज में स्नातक कि पढ़ाई कर रहा था। मेरी बी एस सी के भौतिक शास्त्र के लैब का क्लास था और मैं अपने एक साथी के साथ एक प्रयोग में व्यस्त था।  तभी हमें थोड़ी सहायता कि जरूरत आन पड़ी और हम लोग लैब अटेंडेंट के पास गए। वो हमारे डेस्क पर आते के साथ ही थोड़ी बहुत बातचीत के बाद हमारी जाति के बारे में पूछा तो हमने भी सीधा सा जवाब दे दिया कि हम बैकवर्ड कास्ट से आते हैं ताकि बात और ना  बढे और हम अपने प्रयोग को ख़त्म कर हॉस्टल वापस जाएँ।  इस बात पर उसने कहा - हाँ आज काल तो कोई भी कास्ट वाला पढ़ने लगा है।  हमें बुरा तो लगा लेकिन हम हर वक़्त झगडने लगते नहीं हैं।  लड़ तो लें लेकिन मानसिकता कहाँ बदलें।

यह २००० साल कि बात  है।  इस वाक्या से  एक बात एक बात साफ़ हो जाती है कि पढ़े लिखे होने के बाद भी काफी हद तक लोगो कि मानसिकताएं नहीं बदलती हैं।

मेरे विचार से इस तरह कि रूढ़िवादी विचारधारा तभी बदलेगी जब हम अपने कुएं से बाहर निकलेंगे।  विदेश भ्रमण करेंगे। अपने आप तो थोपने कि जगह दूसरों को सुनेंगे भी। अन्तर्जाती विवाह को ज्यादा से ज्यादा होने देंगे। अन्तर्जाती ही क्यों विभिन्न धर्मों  में भी विवाह को स्वीकार करेंगे और मानवता के दुश्मनो को बिना उसके पहचान के सज़ा देंगे।  मानवता के दुश्मनों का बहिष्कार करेंगे।  और सबसे अधिक जरूरी कि मन कि ईमानदारी को सुनेंगे।

धार्मिक संस्थाओं बैठे मूड व्यक्तिओं को  एक सिरे से खारिज़ करने कि जरूरत है। और सबसे बढ़कर लोगो को अपने धर्म से परे , जाति से परे, हर तरह के विवादों से परे देश को ध्यान में रख कर अपने मत के बारे में सोचना होगा।

Sunday, February 2, 2014

बदलेगा देश।

१९७५ में बिहार आंदोलन को राष्ट्रीय भ्रष्टाचार आंदोलन में हरियाणा में तब्दील किया गया था। आज भी एक हरियाणा का वीर उन्ही राहो पर फिर से चल पड़ा है।
एक वो वक़्त था जब प्रधान मंत्री को भी कटघरे में आना  पड़ा एक ये वक़्त है जब सीबीआई को तोता कहा जाता है और भ्रष्टाचारियों को भ्रष्टाचारी कहने पर मानहानी कि धमकी दी जाती है।

कुछ हो न हो कम से कम इतना जरुर होगा अबकी, कि हर एक तथाकथित वरिष्ट नेताओं को एक एक वोट के लिए मन्नते मांगनी होगी।
बदलेगा देश।

मेट्रो बंद हो गयी

हैरत होता है मुझे यह देख कर कि हम वही लोग हैं जो दशकों से चुप्पी साधे, बैठे , हर भ्रष्टाचार और राष्ट्रीय सम्पदा के लूट का तमाशबीन बने रहे। तक़दीर और वक़्त को जिम्मेदार कहते रहे, आज ३६ घंटे के लिए मेट्रो क्या बंद हो गयी एक राष्ट्र के लिए लड़ने वाले को अराजक और गैरजिम्मेदार कहने में  एक क्षण भी  नहीं  लगाये। सैकड़ों विधायकों के लिए रोकी गयी ट्राफिक का हिस्सा बनते हुए कभी ऐसी तकलीफ जिन्हे नहीं हुई उन्ही को स्थापित राह बदल कर दूसरी राह भर पकड़ कर जाने में इतनी तकलीफ हुई कि अमानवीयता का शिकार हुई , अपने ही घर में जलाई गयी महिला के हृदयविदारक  जलन को भूल गए।
स्वार्थ में जीने और राहों कि एक ही ढर्रे से चलने वाले वक़्त कि सुई को थमना होगा।
अब और नहीं।
इतना आसान नहीं है लेकिन बदलेगा देश।

शेखर कपूर के ट्विटर पर

आशाओं कि गर्म हवा उनकी पक्की दीवारें, बंद दरवाज़ो और ठन्डे दफ्तरों तक कैसे पहुंचे। बेहतर है सरकार सड़कों पे बैठे। जनता का शोर तो सुन सकें Via Shekhar Kapur on Twitter.

सोचने लगता हूँ - क्या भावनायें शासन के साथ कदम मिलाकर चल सकतीं हैं ? पता नहीं। जन्म से - राजनीती बुरी बला - का नारा सुनते आया हूँ। इतिहास में राजनीति के नाम पर लोगो कि हत्यायों कि मार्मिक और हृदयविदारक कथाये सुनी हैं। शासन के नाम पर ऊँची ऊँची कुर्सियों पर लगे नगमे देखे हैं , लाव लश्कर देखे हैं , निजता के भाव देखे हैं। दायें बाएं झाकता हूँ तो कोई नहीं दीखता इनको साथ में लेकर चलने वाला।
लेकिन दीपक जलाने कि कोशिश की है किसी ने।