कल ऑफिस जाते वक़्त असाधारण कुछ हुआ नहीं लेकिन जाने क्यों एक लघुकथा याद करने का तुक मिल गया।
मोटरसाइकिल पर ऑफिस या यहाँ वहाँ जाना जैसे नियति है मेरी। कई दोस्त या सहपाठी या सहकर्मी अब तक कम से कम मारुती ८०० तो जरुर खरीद लिए हैं। मेरी जिंदगी में कुछ ऐसे अवसर आते रहते हैं कि बस ले नहीं पाता हूँ। काफी कचोटता भी है मन जब ३ साल के बेटे को मोटरसाइकिल के आगे बिठा का कहीं ले जाता हूँ और गंतव्य स्थान पर उतर कर जब बेटा अपनी आँखे मलता है। खैर यह सोच का मन को संतावना देता रहता हूँ कि सब चांदी कि चम्मच लिए पैदा नहीं होते और मेरे दिन भी बदलेंगे। हालाँकि अब तक कुछ इसके आसार दिखे नहीं हैं।
उम्र के तीसरे दशक में हूँ और अक्सर मन से कहता रहता हूँ कि मैं परिपक्व हो चुका हूँ और अर्ध वयस्कता वाली हरकते अब मुझे शोभा नहीं देगी या मुझे करना नहीं चाहिए। फिर भी गाहे बगाहे कुछ कर ही देता हूँ।
जब हम मोटरसाइकिल खरीदते हैं तो यह यूजर मैन्युअल में यह पढ़ते हैं कि चलाते समय स्पीड को सामानांतर रखना ईंधन कि उपयोगिता को बढ़ाता है। यही सोच कर मैं अपनी स्पीड को ४५-५० के बीच में ही रखता हूँ। कल एक महानुभाव ने मेरे करीब से अपनी मोटरसाइकिल निकाल दी। मानो मुझे चुनौती देता हुआ आगे बढ़ा हो। भला मैं ऐसे अवसर में कब पीछे हटने वाला। मैंने भी अपनी दाहिने हथेली का ज़ोर नीचे कि दिशा में बढ़ाना शुरू किया। लेकिन यह क्या। मुझे चुनौती देने वाला शक्श आड़ी-तिरछी चाल चलने लगा ताकि मैं उससे आगे न निकल पाउँ। पीछे से आती हुई एक बड़ी गाडी ने हमारी इस अनकही प्रतिस्पर्धा को ख़त्म किया। मैं उससे आगे बढ़ा ही था कि उसका मोड़ आ गया और उसने कोई और राह पकड़ी। और मैं फिर से यूजर मैन्युअल को याद करता हुआ अपने ऑफिस कि तरफ अग्रसर हुआ।
हालांकि यह कमो-बेश हर रोज़ कि कहानी है पर आज एक लघुकथा का स्मरण हो गया।
ऐसा माना जाता है कि चीन वाले मेढक का मांस खाते हैं. भारत से मेढकों से भरा एक कंटेनर जल जहाज से चीन कि ओर जा रहा था। चीन के बन्दरगाह पर जब जहाज पहुंचा और परेषिती ने माल जांच करने के इरादे से कंटेनर को ऊपर से झांका तो पाया कि कंटेनर का ढक्कन खुला हुआ हैं। उसने तुरंत ही भारत, अपने प्रेषक को, फ़ोन लगाया और पूछा कि ढक्कन खुला क्यों रखा। प्रेषक से खेद जताते हुए यह कहा कि "जनाब ये भारत के मेढक हैं अगर कोई भागने कि
यह कहानी सुनने में काफी साधारण सी लगती है लेकिन यह भारतियों कि विस्तृत मानसिकता का परिचय देती है। भले ही हम अपनी झूठी गौरव का हवाला देते हुए इसे झुठला दें लेकिन करीब करीब हर एक व्यवसायी या नौकरी पेशा इस तरह कि अनुभव से कम से कम एक बार तो वाकिफ होता ही हैं।(मैं ऐसा कदापि नहीं कह रहा कि दुसरे देशों में लोग ऐसा नहीं करते होंगे)
(साभार : कहीं किसी ब्लॉग में पढ़ा था, कहाँ याद नहीं )
२८ फरबरी २०१४
मोटरसाइकिल पर ऑफिस या यहाँ वहाँ जाना जैसे नियति है मेरी। कई दोस्त या सहपाठी या सहकर्मी अब तक कम से कम मारुती ८०० तो जरुर खरीद लिए हैं। मेरी जिंदगी में कुछ ऐसे अवसर आते रहते हैं कि बस ले नहीं पाता हूँ। काफी कचोटता भी है मन जब ३ साल के बेटे को मोटरसाइकिल के आगे बिठा का कहीं ले जाता हूँ और गंतव्य स्थान पर उतर कर जब बेटा अपनी आँखे मलता है। खैर यह सोच का मन को संतावना देता रहता हूँ कि सब चांदी कि चम्मच लिए पैदा नहीं होते और मेरे दिन भी बदलेंगे। हालाँकि अब तक कुछ इसके आसार दिखे नहीं हैं।
उम्र के तीसरे दशक में हूँ और अक्सर मन से कहता रहता हूँ कि मैं परिपक्व हो चुका हूँ और अर्ध वयस्कता वाली हरकते अब मुझे शोभा नहीं देगी या मुझे करना नहीं चाहिए। फिर भी गाहे बगाहे कुछ कर ही देता हूँ।
जब हम मोटरसाइकिल खरीदते हैं तो यह यूजर मैन्युअल में यह पढ़ते हैं कि चलाते समय स्पीड को सामानांतर रखना ईंधन कि उपयोगिता को बढ़ाता है। यही सोच कर मैं अपनी स्पीड को ४५-५० के बीच में ही रखता हूँ। कल एक महानुभाव ने मेरे करीब से अपनी मोटरसाइकिल निकाल दी। मानो मुझे चुनौती देता हुआ आगे बढ़ा हो। भला मैं ऐसे अवसर में कब पीछे हटने वाला। मैंने भी अपनी दाहिने हथेली का ज़ोर नीचे कि दिशा में बढ़ाना शुरू किया। लेकिन यह क्या। मुझे चुनौती देने वाला शक्श आड़ी-तिरछी चाल चलने लगा ताकि मैं उससे आगे न निकल पाउँ। पीछे से आती हुई एक बड़ी गाडी ने हमारी इस अनकही प्रतिस्पर्धा को ख़त्म किया। मैं उससे आगे बढ़ा ही था कि उसका मोड़ आ गया और उसने कोई और राह पकड़ी। और मैं फिर से यूजर मैन्युअल को याद करता हुआ अपने ऑफिस कि तरफ अग्रसर हुआ।
हालांकि यह कमो-बेश हर रोज़ कि कहानी है पर आज एक लघुकथा का स्मरण हो गया।
ऐसा माना जाता है कि चीन वाले मेढक का मांस खाते हैं. भारत से मेढकों से भरा एक कंटेनर जल जहाज से चीन कि ओर जा रहा था। चीन के बन्दरगाह पर जब जहाज पहुंचा और परेषिती ने माल जांच करने के इरादे से कंटेनर को ऊपर से झांका तो पाया कि कंटेनर का ढक्कन खुला हुआ हैं। उसने तुरंत ही भारत, अपने प्रेषक को, फ़ोन लगाया और पूछा कि ढक्कन खुला क्यों रखा। प्रेषक से खेद जताते हुए यह कहा कि "जनाब ये भारत के मेढक हैं अगर कोई भागने कि
कोशिश भी कर रहा होगा तो दूसरा उसकी टांग खीच रहा होगा और इस तरह मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कोई नहीं भागा (या समुद्र में कूदा होगा होगा। पावक का मन नहीं माना और उसने गिनती करी शुरू कर दी और पाया कि सही मायने में एक भी मेढक भाग नहीं पाया।
(साभार : कहीं किसी ब्लॉग में पढ़ा था, कहाँ याद नहीं )
२८ फरबरी २०१४



