Thursday, February 13, 2014

मेरा मत, मेरा दिल


हम आये दिन अपने नेताओं कि  बुराई करते रहते हैं।  जो मर्ज़ी वो कहते हैं।  लकीर के उस तरफ से दूसरी तरफ के बारे को कुछ भी कहना  हर वक़्त आसान होता है।  आज मुझे कबीर  जी का दोहा याद आ रहा है -

बुरा जो देखना मैं चला, बुरा ना मिलिया कोई।
जो दिल ढूंढा अपना , मुझ  सा बुरा न कोई।।

यह् हमारी पुरानी आदत है, सदैव दूसरों में अवगुण  ढूंढना।  हम कभी अपनी करणी नहीं देखते।  कभी नहीं सोचते आज जो  हम  कर रहे हैं  इसका  दूरगामी  असर क्या होगा।

अक्सर मैंने  अपने दोस्तों को , अपने पड़ोसियों को हर तरह के चुनाओ से पहले प्रत्याशियों  के बारे में बाते करते सुना है।  उन चर्चाओं में कभी भी किसी व्यक्ति के चरित्र या उसके पिछली आचरण को या उसके क्षमता के बारे में बात नहीं करते हैं।  अक्सर उसके आने या ना आने से हमारा क्या फायदा होगा ये सोचते हैं वो किस जाति का वो किस धर्म का है उससे हमारे कितने घनिष्ट सम्बन्ध है इस बारे में बातें होती हैं।

आज  कल सदन में बढ़ती सांसदों द्वारा कि जाने वाली  असवैधानिक व्यवहारों का बढ़ता चलन इस बात को साफ़ इंगित  करता है कि हम मतदाताओं का बौद्धिक स्तर सोच से परे गिर गया है।

क्या ऐसा कहा जा सकता है कि  शिक्षा कि कमी इसका कारण है।  आप कह सकते हैं हां। लेकिन मैं इसे कुछ हद तक ही कारक मानूंगा। मैं अपनी इस दलील को सिद्ध करने के लिए एक वाक्या पेश करता हूँ।

तब मैं पटना साईंस कॉलेज में स्नातक कि पढ़ाई कर रहा था। मेरी बी एस सी के भौतिक शास्त्र के लैब का क्लास था और मैं अपने एक साथी के साथ एक प्रयोग में व्यस्त था।  तभी हमें थोड़ी सहायता कि जरूरत आन पड़ी और हम लोग लैब अटेंडेंट के पास गए। वो हमारे डेस्क पर आते के साथ ही थोड़ी बहुत बातचीत के बाद हमारी जाति के बारे में पूछा तो हमने भी सीधा सा जवाब दे दिया कि हम बैकवर्ड कास्ट से आते हैं ताकि बात और ना  बढे और हम अपने प्रयोग को ख़त्म कर हॉस्टल वापस जाएँ।  इस बात पर उसने कहा - हाँ आज काल तो कोई भी कास्ट वाला पढ़ने लगा है।  हमें बुरा तो लगा लेकिन हम हर वक़्त झगडने लगते नहीं हैं।  लड़ तो लें लेकिन मानसिकता कहाँ बदलें।

यह २००० साल कि बात  है।  इस वाक्या से  एक बात एक बात साफ़ हो जाती है कि पढ़े लिखे होने के बाद भी काफी हद तक लोगो कि मानसिकताएं नहीं बदलती हैं।

मेरे विचार से इस तरह कि रूढ़िवादी विचारधारा तभी बदलेगी जब हम अपने कुएं से बाहर निकलेंगे।  विदेश भ्रमण करेंगे। अपने आप तो थोपने कि जगह दूसरों को सुनेंगे भी। अन्तर्जाती विवाह को ज्यादा से ज्यादा होने देंगे। अन्तर्जाती ही क्यों विभिन्न धर्मों  में भी विवाह को स्वीकार करेंगे और मानवता के दुश्मनो को बिना उसके पहचान के सज़ा देंगे।  मानवता के दुश्मनों का बहिष्कार करेंगे।  और सबसे अधिक जरूरी कि मन कि ईमानदारी को सुनेंगे।

धार्मिक संस्थाओं बैठे मूड व्यक्तिओं को  एक सिरे से खारिज़ करने कि जरूरत है। और सबसे बढ़कर लोगो को अपने धर्म से परे , जाति से परे, हर तरह के विवादों से परे देश को ध्यान में रख कर अपने मत के बारे में सोचना होगा।

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