अक्सर देखा गया है लोग केवल अपने ही धर्म को बेहतर समझते हैं। दुसरे धर्म को बराबर या अच्छा नहीं बल्कि निहायत ही घटिया समझते हैं। ये हमारा अतिरिक्त मिथ्या स्वयं के अतिचतुर या अतिविशिष्ट होने का घमंड ही है जो हमें दूसरों के धर्म में नीचा दिखाने के लिए प्रेरित करता रहता है। भला ऐसी क्या बात है किसी के धर्म में जो उसे दुसरे धर्म को मानने वाले लोगो के प्रति घृणा पैदा करता है। जितना मुझे अब तक अनुभव या ज्ञान प्राप्त हुआ है उसके अनुसार कोई भी धर्म हिंसा या घृणा नहीं सिखाता है। फिर भला अपने धर्म को दूसरों को मनवाने कि इतनी चाह क्यों।
चलिए एक छोटा सा सवाल हम खुद से करते हैं। अगर "X" हिंदू है और वो दिन भर मुस्लिम के अल्लाह को या ईसाई के ईसू मसीह को गाली देता रहता है या वो सूअर का मांस खाता है। उसे कुछ भी नहीं होता है।
"Y" मुस्लिम है वह दिन भर हिंदुओं के विभिन्न भगवान को और ईसाई के ईसू मसीह को गाली देता रहता है या बैल का मांस खाता है। उसे कुछ भी नहीं होता है।
"Z" ईसाई है वह सदैव हिंदू, मुस्लिम के मान्यताओं पर हँसता रहता है अपशब्द कहता है या सुअर या बैल का मांस खाता है उसे भी कुछ नहीं होता है।
यानि कि एक भगवान का दुसरे भगवान से किसी प्रकार का संवाद नहीं होता है या "Y" "X" के भक्तों का बाल बांका नहीं कर सकता है। उसी प्रकार "Z" "Y" के भक्तों का बाल बांका नहीं कर सकता है। सुनने में काफी अज़ीब लगता है ना?
सारे धर्मग्रन्थ यह कहते हैं कि भगवान एक ही है। हमारा यह सवाल इस तथ्य को तो गलत साबित कर रहा है।
या हम यह भी मान सकते हैं कि भगवान है ही नहीं और हम किसी प्रकार के मिथ्या सिद्धांतों के सहारे जी रहे हैं।
अच्छा हो हम इस सवाल को सवाल ही रहने दें।
अब, सारे भगवान एक हैं इस तथ्य पर भी थोडा गौर करते हैं। इस एक-भगवान प्यार नाम के एक चीज़ का निर्माण किया। यह कम से कम हर धर्म में माना जाता है। एक हिन्दू लड़के को मुस्लिम लड़की से प्यार हो जाता है या एक ईसाई लड़के को हिन्दू लड़की से प्यार हो जाता है। ये लोग भी बचपन से अपने अपने धर्मो के रूढीवादों को देखते आते हैं। लेकिन प्यार हो जाने के बाद जैसे हर एक कर्म काण्ड मित्थ्या लगने लगती है। क्यों ? दिल में किसी के प्रति प्यार का भर जाना को किसी एक प्रक्रिया के तहत ही होता होगा। अगर यह माने कि इस अनुभूति को भगवान अपने भक्तों के सृजन के वक़्त उसके ज़िस्म में डालते हैं तो विभिन्न जीवों में या अनुभूति एक जैसी क्यों ? कहीं इस अनुभूति वाला रसायन किसी एक ने ही तो नहीं बनाया। कहीं सारे भगवान एक तो नहीं ?
अगर एक नहीं तो सबके ज़िस्म के खून का रंग लाल ही क्यों ? मुस्लिम का नीला, हिन्दू का पीला और ईसाई का गुलाबी क्यों नहीं?
और अगर एक ही है तो किसी के मन में सबके लिए प्यार और किसी के मन में दूसरों के खून पिने कि इच्छा क्यों ?
गुत्थियों में गुत्थी और जलेबी सी उलझन। अच्छा हो हम इस सवाल को सवाल ही रहने दें।
(यहाँ जिन तथ्यों का विवरण है उसकी प्रेरणा एक अंग्रेजी फ़िल्म "The Vertical Limit" से ली गयी है )
चलिए एक छोटा सा सवाल हम खुद से करते हैं। अगर "X" हिंदू है और वो दिन भर मुस्लिम के अल्लाह को या ईसाई के ईसू मसीह को गाली देता रहता है या वो सूअर का मांस खाता है। उसे कुछ भी नहीं होता है।
"Y" मुस्लिम है वह दिन भर हिंदुओं के विभिन्न भगवान को और ईसाई के ईसू मसीह को गाली देता रहता है या बैल का मांस खाता है। उसे कुछ भी नहीं होता है।
"Z" ईसाई है वह सदैव हिंदू, मुस्लिम के मान्यताओं पर हँसता रहता है अपशब्द कहता है या सुअर या बैल का मांस खाता है उसे भी कुछ नहीं होता है।
यानि कि एक भगवान का दुसरे भगवान से किसी प्रकार का संवाद नहीं होता है या "Y" "X" के भक्तों का बाल बांका नहीं कर सकता है। उसी प्रकार "Z" "Y" के भक्तों का बाल बांका नहीं कर सकता है। सुनने में काफी अज़ीब लगता है ना?
सारे धर्मग्रन्थ यह कहते हैं कि भगवान एक ही है। हमारा यह सवाल इस तथ्य को तो गलत साबित कर रहा है।
या हम यह भी मान सकते हैं कि भगवान है ही नहीं और हम किसी प्रकार के मिथ्या सिद्धांतों के सहारे जी रहे हैं।
अच्छा हो हम इस सवाल को सवाल ही रहने दें।
अब, सारे भगवान एक हैं इस तथ्य पर भी थोडा गौर करते हैं। इस एक-भगवान प्यार नाम के एक चीज़ का निर्माण किया। यह कम से कम हर धर्म में माना जाता है। एक हिन्दू लड़के को मुस्लिम लड़की से प्यार हो जाता है या एक ईसाई लड़के को हिन्दू लड़की से प्यार हो जाता है। ये लोग भी बचपन से अपने अपने धर्मो के रूढीवादों को देखते आते हैं। लेकिन प्यार हो जाने के बाद जैसे हर एक कर्म काण्ड मित्थ्या लगने लगती है। क्यों ? दिल में किसी के प्रति प्यार का भर जाना को किसी एक प्रक्रिया के तहत ही होता होगा। अगर यह माने कि इस अनुभूति को भगवान अपने भक्तों के सृजन के वक़्त उसके ज़िस्म में डालते हैं तो विभिन्न जीवों में या अनुभूति एक जैसी क्यों ? कहीं इस अनुभूति वाला रसायन किसी एक ने ही तो नहीं बनाया। कहीं सारे भगवान एक तो नहीं ?
अगर एक नहीं तो सबके ज़िस्म के खून का रंग लाल ही क्यों ? मुस्लिम का नीला, हिन्दू का पीला और ईसाई का गुलाबी क्यों नहीं?
और अगर एक ही है तो किसी के मन में सबके लिए प्यार और किसी के मन में दूसरों के खून पिने कि इच्छा क्यों ?
गुत्थियों में गुत्थी और जलेबी सी उलझन। अच्छा हो हम इस सवाल को सवाल ही रहने दें।
(यहाँ जिन तथ्यों का विवरण है उसकी प्रेरणा एक अंग्रेजी फ़िल्म "The Vertical Limit" से ली गयी है )
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