कई लोग अपनी ज़िन्दगी में रोज़ मरते हैं। लेकिन उनमे इतनी या तो इच्छाशक्ति नहीं होती है कि अपनी जान खुद ले सकें या शारीरिक रूप से इतनी अक्षम होते हैं कि ऐसा कर नहीं सकते। मूल रूप में देंखें तो तीन तरह के ऐसे लोग होते हैं पहला - बेहद बोझिल, वेदना से पूर्ण, इच्छाशक्ति के निम्नतर सतह पर लेकिन किसी तरह जिंदगी कि नाव खेते लोग। ये यह चाहते हैं या तो भूकम्प आ जाये या जिस रेल से ये चलें वो उलट जाये या ऐसा ही कुछ हो जाये जब इन्हे पता न चले और ये रेलमपेल कि ज़िन्दगी से निकल मोक्ष पा सकें। लेकिन ये खुद से आत्महत्या नहीं कर सकते। दुसरे वो लोग हैं जो पहली वाली श्रेणी में आंशिक रूप हैं इच्छाशक्ति भी है लेकिन पारिवारिक दवाब इतनी है कि कुछ नहीं कर सकते और जिंदगी को जैसी है वैसी जी रहे हैं। तीसरे वो लोग हैं जिन्हे जीने के लिए कुछ बचा नहीं है। जो दूसरों पर बोझ हैं। और इस वजह से खुद से आहात भी हैं अंततः मरना चाहते हैं लेकिन उनके सगे उन्हें मरने नहीं देते। जबकि उनकी शारीरिक पीड़ा इतनी है कि जीने को कोई तमन्ना शेष नहीं।
इस तीसरे किस्म के लोगो के लिए है "स्वैच्छिक निष्क्रिय इच्छामृत्यु"। यानि "एक व्यक्ति के स्पष्ट अनुरोध पर किसी अन्य के द्वारा जीवन की जानबूझकर समाप्ति कि इच्छा"। हमने राईट टू एडुकेशन, राईट टू हेल्थ, राईट टू जस्टिस इत्यादि सुना है लेकिन राईट टू डेथ के बारे में कभी सोचा नहीं।
वे जिनकी जिंदगी उनके खुद के लिए मौत से भी बदतर, जो मौत को गले लगाने के लिए बेचैन, और जिनकी जिंदगी किसी और के लिए मानसिक/आर्थिक पीड़ा पहुचने वाली हो को भला क्यों नहीं उनकी इच्छा के अधीन कर दिया जाये। व्यवहारिक होकर न सोचें तो अमानवीय लगता है।
मेरे विचार से यह उनके चाहने वालों के लिए भी बेहतर उपाय है जो रोज़ ऊन्हे कराहते सुनते या देखते हैं।
आज सर्वोच्च न्यायालय ने इसको क़ानूनी बनाने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए वक़्त माँगा। जाहिर है ऐसी किसी याचिका पर किसी तरह के हाँ या ना तरह के आदेश का सुना पाना उनके लिए काफी मुस्किल है।
क्यों ना न्यायालयही ऐसी किसी कमिटी का गठन करे जिसने तमाम तरह के शिक्षाविद, सामाजिक/धार्मिक प्रतिनिधि, वकील, मानवाधिकार संस्था से जुड़े लोग हों और एक उच्चस्तरीय वार्तालाप हो।
जिस तरह कि जिंदगी के तरफ हम दिन प्रतिदिन बढ़ रहे हैं इस तरह के मरीजों कि संख्या के बढ़ने कि ही सम्भावना है। स्वाथ्य संस्थानों के सेवाओं कि बढ़ती कीमतें, बढ़ता प्रदुषण, कृत्रिम जिंदगी कि बढ़ती लालसा ऐसी बाते हैं जो हमारे लक्ष्यों में शुमार हो चुके हैं।
वे जिनकी भगवान् सुनना बंद कर दें, डॉक्टर जहां असहाय हो उनके बारे में कुछ तो सोचना ही होगा।
इस तीसरे किस्म के लोगो के लिए है "स्वैच्छिक निष्क्रिय इच्छामृत्यु"। यानि "एक व्यक्ति के स्पष्ट अनुरोध पर किसी अन्य के द्वारा जीवन की जानबूझकर समाप्ति कि इच्छा"। हमने राईट टू एडुकेशन, राईट टू हेल्थ, राईट टू जस्टिस इत्यादि सुना है लेकिन राईट टू डेथ के बारे में कभी सोचा नहीं।
वे जिनकी जिंदगी उनके खुद के लिए मौत से भी बदतर, जो मौत को गले लगाने के लिए बेचैन, और जिनकी जिंदगी किसी और के लिए मानसिक/आर्थिक पीड़ा पहुचने वाली हो को भला क्यों नहीं उनकी इच्छा के अधीन कर दिया जाये। व्यवहारिक होकर न सोचें तो अमानवीय लगता है।
मेरे विचार से यह उनके चाहने वालों के लिए भी बेहतर उपाय है जो रोज़ ऊन्हे कराहते सुनते या देखते हैं।
आज सर्वोच्च न्यायालय ने इसको क़ानूनी बनाने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए वक़्त माँगा। जाहिर है ऐसी किसी याचिका पर किसी तरह के हाँ या ना तरह के आदेश का सुना पाना उनके लिए काफी मुस्किल है।
क्यों ना न्यायालयही ऐसी किसी कमिटी का गठन करे जिसने तमाम तरह के शिक्षाविद, सामाजिक/धार्मिक प्रतिनिधि, वकील, मानवाधिकार संस्था से जुड़े लोग हों और एक उच्चस्तरीय वार्तालाप हो।
जिस तरह कि जिंदगी के तरफ हम दिन प्रतिदिन बढ़ रहे हैं इस तरह के मरीजों कि संख्या के बढ़ने कि ही सम्भावना है। स्वाथ्य संस्थानों के सेवाओं कि बढ़ती कीमतें, बढ़ता प्रदुषण, कृत्रिम जिंदगी कि बढ़ती लालसा ऐसी बाते हैं जो हमारे लक्ष्यों में शुमार हो चुके हैं।
वे जिनकी भगवान् सुनना बंद कर दें, डॉक्टर जहां असहाय हो उनके बारे में कुछ तो सोचना ही होगा।
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