Sunday, February 2, 2014

शेखर कपूर के ट्विटर पर

आशाओं कि गर्म हवा उनकी पक्की दीवारें, बंद दरवाज़ो और ठन्डे दफ्तरों तक कैसे पहुंचे। बेहतर है सरकार सड़कों पे बैठे। जनता का शोर तो सुन सकें Via Shekhar Kapur on Twitter.

सोचने लगता हूँ - क्या भावनायें शासन के साथ कदम मिलाकर चल सकतीं हैं ? पता नहीं। जन्म से - राजनीती बुरी बला - का नारा सुनते आया हूँ। इतिहास में राजनीति के नाम पर लोगो कि हत्यायों कि मार्मिक और हृदयविदारक कथाये सुनी हैं। शासन के नाम पर ऊँची ऊँची कुर्सियों पर लगे नगमे देखे हैं , लाव लश्कर देखे हैं , निजता के भाव देखे हैं। दायें बाएं झाकता हूँ तो कोई नहीं दीखता इनको साथ में लेकर चलने वाला।
लेकिन दीपक जलाने कि कोशिश की है किसी ने।

No comments: