Monday, January 9, 2012

पहला पड़ाव.

उस मोड़ के बाद,
पहला पड़ाव.
चलो मुड कर देखें,
थोड़ा मन मंथन करें,
थोड़ा अन्दर झाकें,

कुछ बाहर की सुधी लें |
क्या खोया क्या पाया,
किस की थी आस,
क्या मिल गया,
किसके खोने का मलाल भर गया ?
कुछ नहीं !
हर मन प्यासा मिला,
हर मन में अमृत मिला,
हर मन में विषाद मिला,
"जिन खोजा तिन पाइयां",
सच लगा-
बचपन का पढ़ा दोहा,
इस मोड़ पर अपने अर्थ से अवगत करा गया |

पहला पड़ाव,
क्या पहला क्या दूसरा,
ज़िन्दगी तो सफ़र है,
बस चलते रहना ही ज़िन्दगी है |

काफी वक़्त लग गया.

काफी वक़्त लग गया तुम्हें ढूढने में,
क्या करूँ,
थोड़ा लेट लतीफ़ हूँ, मैं.
कुछ तो इन लकीरों में था,
कुछ तकदीर की रजामंदियों में नहीं था .
काफी वक़्त लग गया लम्हों के मिजाज़ को जानने में,
क्या करूं.

जाने क्या नाम दूं इन अन्दर के उबालों का,
जेहन के तह में शायद दरिया है कहीं.
काफी वक़्त लग गया मेरी लहरों को किनारे का पता पूछने में,
क्या करूं.

कभी यूँ ही सोचने लगता हूँ, बहते बहते,
क्या कभी इसका भी तापमान घट जायेगा,
क्या मैं भी गिना जाऊंगा भीड़ में खो जाने वाले कई आधे कच्चे आधे पक्के बालों वाले सिरों के गिन्तिंयों में,
कुछ लोग किनारे से गहराई का पता नहीं लगा पाते,
कफी वक़्त लग जाएगा - फूल से बीज और बीज से वापस पेड़ बनता है जानने में,
क्या करूँ.

चलो उम्मीद करें |

जाने कौन सी कश्ती में आ गया,
ना माझी है ना पतवार,
देखूं जो चहुओर,
ना किनारा दिखे ना मझधार
रंग ही रंग भरे थे उस रोज़ आँखों में मेरी,
ऐ, व्यार, बता दे रुख जरा, ये कैसा तेरा व्यवहार .

जाने कौन सी कश्ती में आ गया,
सफ़ेद, नीला, विस्तृत ,
कभी टेढ़े, कभी सीधे, कभी गोते, कभी उपर, अविस्मित
क्या फैले सादेपन को मन में उतारने में,
या, इनके बीच सम्मिलित कोलाहल में रमने में,
जिन्दगी है
किंकर्तव्यविमूढ़
"मन रे, तू काहे ना धीरज धरे"
हर घर्षण में चिंगारी है
रेशम तो बनो

जाने कौन सी कश्ती में आ गया
सूर्यास्त !
आहा, रंग आया, भरे भरे,
नीले, केसरी, सपाट, नकेले ,
चलो गम ना करें शाम का ,
पलकें बिछाएं नयी सुबह का
रंग का क्या है ,
जो मिला, दो रंग बना तीसरा,
हर तस्वीर में रंग तुम्हारा ही है ,

उम्मीद तो करो

अजनबी शहर

रंगमंच में -
इन दिनों नया है बहुत कुछ और थोडा अलग,
रंग है अलग, जबान है अलग,
लेकिन अजनबी कुछ नहीं.
दृश्य, मंच, पट वही, कलाकार हैं अलग.

कैसे कहूं इन्हें अजनबी,
सफ़र के हर मोड़ पर
वे ही मिले -
छः ज्ञानेन्द्रियों वाले लोग.
अजनबी कुछ नहीं.