Monday, January 9, 2012

चलो उम्मीद करें |

जाने कौन सी कश्ती में आ गया,
ना माझी है ना पतवार,
देखूं जो चहुओर,
ना किनारा दिखे ना मझधार
रंग ही रंग भरे थे उस रोज़ आँखों में मेरी,
ऐ, व्यार, बता दे रुख जरा, ये कैसा तेरा व्यवहार .

जाने कौन सी कश्ती में आ गया,
सफ़ेद, नीला, विस्तृत ,
कभी टेढ़े, कभी सीधे, कभी गोते, कभी उपर, अविस्मित
क्या फैले सादेपन को मन में उतारने में,
या, इनके बीच सम्मिलित कोलाहल में रमने में,
जिन्दगी है
किंकर्तव्यविमूढ़
"मन रे, तू काहे ना धीरज धरे"
हर घर्षण में चिंगारी है
रेशम तो बनो

जाने कौन सी कश्ती में आ गया
सूर्यास्त !
आहा, रंग आया, भरे भरे,
नीले, केसरी, सपाट, नकेले ,
चलो गम ना करें शाम का ,
पलकें बिछाएं नयी सुबह का
रंग का क्या है ,
जो मिला, दो रंग बना तीसरा,
हर तस्वीर में रंग तुम्हारा ही है ,

उम्मीद तो करो

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