काफी वक़्त लग गया तुम्हें ढूढने में,
क्या करूँ,
थोड़ा लेट लतीफ़ हूँ, मैं.
कुछ तो इन लकीरों में था,
कुछ तकदीर की रजामंदियों में नहीं था .
काफी वक़्त लग गया लम्हों के मिजाज़ को जानने में,
क्या करूं.
जाने क्या नाम दूं इन अन्दर के उबालों का,
जेहन के तह में शायद दरिया है कहीं.
काफी वक़्त लग गया मेरी लहरों को किनारे का पता पूछने में,
क्या करूं.
कभी यूँ ही सोचने लगता हूँ, बहते बहते,
क्या कभी इसका भी तापमान घट जायेगा,
क्या मैं भी गिना जाऊंगा भीड़ में खो जाने वाले कई आधे कच्चे आधे पक्के बालों वाले सिरों के गिन्तिंयों में,
कुछ लोग किनारे से गहराई का पता नहीं लगा पाते,
कफी वक़्त लग जाएगा - फूल से बीज और बीज से वापस पेड़ बनता है जानने में,
क्या करूँ.
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