Friday, August 22, 2014

पाखण्ड का भला यह कैसा प्रमाण

इससे बड़ा पाखण्ड का भला और क्या प्रमाण होगा। आई एस वालों की क्रूरता पिछले कई महीनों से बदस्तूर ज़ारी है। लेकिन मुख्य धारा के मीडिया को यह तब कौंधा जब एक गोरा पत्रकार मारा गया। हाय तौबा तब मची।
पिछले कई महीनों से, आई एस शासित इलाके में, गैर मुस्लिमों को सरे आम मौत के घाट उतारा जा रहा है। न कोई देश खुलकर इसके खिलाफ बोल रहा ना कोई संगठन। 

Tuesday, August 12, 2014

मैं चौकीदार हूँ

मैं चौकीदार हूँ और मैंने अपने ऑफिस में ऊँचे कर तख़्त लगाये हैं. मैं उस पर बैठता हूँ  बाकी नीचे बैठते हैं ताकि मैं सबकी आँखों में देख सकूँ (घूर सकूँ).

मैंने लोकतंत्र को नया नाम दिया है। जिसमे लोकतान्त्रिक अधिकार के तहत लोग केवल मुझे अपनी व्यथा, सलाह, और इच्छाएं सुनाते हैं। मैं सुनने का नाटक करता हूँ।  करता अपने मन की हूँ।  करवाता अपने मन की हूँ।
नौकर की तरह लोगो को अपने सामने खड़े रखता हूँ।  सलाम न ठोकने वाले को किसी न किसी तरीके से ठोक देता हूँ
मैं एक चौकीदार हूँ। मैं हूँ। बस।
न कोई है, न किसी  की औकात हैं, और ना किसी की औकात मैं बनने दूंगा।

मेरे चारो तरफ सुरक्षा कर्मी तैनात रहते हैं। अमरों की तरह, अमीरों की निजी वायुयानों में सफर करता हूँ।

गरीबो से सायद ही मेरा कोई सरोकार है। मेरे सामने या मेरे दोस्तों से सामने उड़ने वालों के मैं  पर क़तर देता हूँ।
मैं एक चौकीदार हूँ। मैं हूँ। बस।

मेरा कोई धर्म नहीं है। मुझपे पैसे लगाने वाले मुझे धर्म की परिभाषा बताते हैं। विकास करना मेरा काम हैं -यह मैं सुनाता हूँ। लेकिन इसके नाम पर मैं सार्वजनिक संपत्ति अपने दोस्तों को सौंप देता हूँ।

मुझे मेरी ज़ी हुज़ूरी करने वाले ही पसंद हैं।

मेरा कोई धर्म नहीं है। मैं चौकीदार हूँ। मैं खून पिता हूँ यदा कदा।

मुझे सायद ही अंग्रेजी आती है लेकिन मैं धाराप्रवाह अंग्रेजी में ट्वीट करता हूँ , फेसबुक के पोस्ट्स भी मेरे अंग्रेजी में ही रहते हैं।  सरकारी संपत्ति का प्रयोग मैं अपने प्रचार प्रसार के लिए लगाता हूँ।

मेरा ना कोई अपना हैं।  मुझपर पैसा लगाने वाले, मेरी महत्वाकांक्षा में मेरा सहयोग करने वाले मुझसे फलीभूत होते हैं और वही मेरे अपने हैं।

मैं एक चौकीदार हूँ


Wednesday, August 6, 2014

प्राण, चाचा चौधरी और साबू के निर्माता का निधन हो गया आज।

प्राण, चाचा चौधरी और साबू के निर्माता का निधन हो गया आज।

टेक्स्ट बुक के बीच तुम्हारे कॉमिक्स छिपा कर, रातों का तेल जलाना अभी भी याद है।
गर्मी की छुट्टियों में जाने से पहले तुम्हारे कॉमिक्स को ट्रैन में पढ़ने के लिए इक्कठ्ठा करना अभी भी याद है।

हमारे समय के बच्चों के दिलों पर राज करने वाले आप हमें हमेशा याद रहेंगे।


Sunday, July 27, 2014

हिन्दू की रक्षा इसकी सुदृढ जड़े कर लेगी

एक बार ग्रेग चैपल ने भारतीय सन्स्कृति के बारे मे यह कहा था की हम मुन्डेर पर सर इसलिये नही रखते क्योंकि हमें डर है की कोई गोली ना चला दे और इसलिये हमे सर झुकाने की आदत हो गई है|

... इनटरनेट के इस युग में फेसबुक पर भी पाखंड और सदियों पुरानी सड़ी आडम्बर को ढोते कुछ युवाओं के लिखे को पढता हूँ तो यदा कदा ग्रेग की बाते याद आ जातीं हैं|
उदाहरण के लिए-हिन्दू रक्षा दल या ब्राह्मण सेना| अपनी सड़ती अंगों को न देख इससे उठती बदबू को दूसरी ओर से आता समझ दौड़ पड़ते है| जनाब हिन्दू की रक्षा इसकी सुदृढ जड़े कर लेगी आप अपना घर देखिये |

Friday, July 25, 2014

Contribution of India to the UN peacekeeping forces

After Bangladesh, India is the largest contributor of soldiers and police personnel to the UN peacekeeping forces. According to officials, those troops are being increasingly pushed into conflicts of active or “robust” fighting, rather than monitoring peace.

In December 2013, five Indian soldiers were killed fighting rebels in South Sudan. The UN Undersecretary-General said he found such situations “unacceptable”, and also criticized the “global north” (US and Europe) for not contributing enough to the forces. “Ninety-five per cent of the peacekeepers are from the (global) South,” Mr. Ladsous explained, “And the North (Europe, U.S. among others) only contributes five per cent to the UNPKF. That is not sustainable and I have been telling NATO, EU countries, when you pull out of Afghanistan this year, you must come back in a more significant way to the UNPKF.”

Courtesy: The Hindu

बुधवार, जुलाई ९, २०१४ - "पीज़ा हट" के रेस्त्रां में

ये इंटीरियर डिज़ाइन वाले साधारण से साधारण चीजों को दीवारों पर इस क़दर टांग देते हैं की अच्छा ही लगता है।
आज हमारे टीम लीडर सत्या ने 'पीज़ा हट' में, अमेरिका जाने की ख़ुशी में, पूरे टीम को दावत दी।
वहीं देखा - प्लास्टिक के पारदर्शी परातों को काले रंग से रंग कर सतह पर कोई चित्र आंका गया हो और फिर पीछे प्रचलित एल-ई-डी वाले बल्ब्स लगा कर दीवारों पर टांगा गया हो।

चमकने वाली कागज के प्लेटों पर कुछ और रंगीन कागज़ और रूई लगा कर जब भाभी कोई सजावट की चीजें बनातीं थीं तो मन में सोचा करता था - भला भाभी क्यों इन सब चीजों में अपना समय बरबाद करतीं हैं।
आज उसी प्रकार के सजावट के बनावटों को इन मॉलों के दीवारों पर देखता हूँ तो उस इंटीरियर डिज़ाइनर के बारे में सोचने लगता हूँ की - इन साधारण सी बनावटों के लिए उसने कितने पैसे लिए होंगे।

खैर यह तो हुई रेस्त्रां की सजावट बारे में। वहीँ बैठे बैठे सोचने लगा वहाँ काम करने वाले कर्मचारी, जो ग्राहक से आर्डर लेते और सर्व करते समय सीखे हुए विभिन्न तरह से इटालियन शब्दों का इस्तमाल करते हैं , इनके रहन सहन, घरेलु बोलचाल या इनके विचार में कितना फर्क आया होगा, यहाँ काम करते हुए।

क्योंकि जब थोड़ा ध्यान से देखता हूँ तो इन होम डिलीवरी करने वालों के ड्रेस के अंदर के कमीज मैले ही होते हैं , ये जो कमर में बेल्ट पहनते हैं वही इनके पैंट को इनके कमर से बंधे रखने का बीड़ा उठाते हैं. ये पिज़ा हट वाले अपने कर्मचारियों को बिना नाप के पैंट पहनाकर ऊपर से एक ओवरकोर्ट से ढंकवाकर अच्छी दिखावट तो कर देते हैं लेकिन उनके जीवन में कितना बदलाव लाते हैं - पता नहीं।
अपने गाँव बेगुसराय में शादियों में बैंड  बाजे वालों की टोली में मास्टर छोड़कर शायद की किसी का ड्रेस ढंग से बना हुआ होता है। चाहे बेगुसराय की क्रक धूम वालों की टीम हो या बैंगलोर के पिज़ा हट वालों के डिलीवरी की टीम - पीसने वाले वही हैं।

सत्या ने करीब ८०००  खर्च किये।
आज २६ जुलाई २०१४ को हमारे अमेरिकी ऑफिस के मैनेजर में हमारे काम से खुश होकर हमें पार्टी देने का वादा किया।  इन्हे भी करीब करीब ८०००  खर्च तो करना ही पड़ेगा अगर हम अपनी टीम मेम्बरों की सँख्या और आज की महँगाई को मद्देनज़र लाएँ  तो।

इन दोनों मौको पर अगर हम इन्ही रुपयों से, जो की १६००० के करीब होगी, कॉपियां खरीद कर सरकारी स्कूलों के बच्चों को बाँट दिए होते - कितनी मुस्कराहटें हमने खरीदी होती।

मैं केवल सोचता रह जाता हूँ।





शिथिल हो गए शरीर को तो बख्श दो।

हमारी जड़ से सड़ चुकी, विकृत से विकृत, अश्लील से अश्लील मानशिकता नहीं तो और क्या है जो हैवानियत से निर्जीव की जा चुकी नग्न शरीर के तस्वीरों को इतना फैला रहीं हैं या इतना वक़्त दे रही हैं ताकि तस्वीर उतरा जा सके।
तुम्हारी हैवानियत को सह चुकी, शिथिल हो गए शरीर को तो बख्श दो। 

१४ जुलाई २०१४

जनाब गिरिराज ने पैसे इकठ्ठा किये थे दुसरे दल  वाले को पाकिस्तान भेजने के लिए-उसे क्या पता था उसके खुद के दल वहाँ चले जायेंगे


१४ जुलाई २०१४ 

शेर के पाऊं में गद्दे लगे होते हैं।

फेसबुक पर सदैव न मो जाप करने वाले और कमल पर बटन दबा कर स्व गौरवान्वित होने वाले भक्त जन, उसके दाहिने के दाहिने हाथ के हाफ़िज़ से मिलने के खबर सुनने के बाद मुह में रसगुल्ला दबा कर चुप्पी की वजह ढूंढने वाले - जान लें - रसगुल्ले भी महंगे होने वाले हैं।
कितने चुप्पी।
खुनी के पाऊं तख़्त से होकर हमारे दरवाजे तक पहुँचने में देर नहीं करेंगे।
सुना हैं शेर के पाऊं में गद्दे लगे होते हैं। 

Thursday, May 8, 2014

Modi is inhuman. Period.

We often argue during our leisure hours in office, in this election season, about Arvind Kejriwal and Narendra Modi. Rahul Gandhi is no way in any discussion. Just thought of jotting down portion of some of the common points that we discuss/argue about.

For many guys, sticking to chair should have been a responsible action on Arvind Kejriwal's part. The same action(of abandoning the power) is commendable in my opinion. 
When it comes to differences between them on personal ground, AK is far far better placed than Modi. Rather Modi is perceived as devil, to be precise. Be it on education, be it on personal integrity, be it on intellectual talent or be it on human values, he just scores negatively. The recent TIME's 100 influential leaders' poll reveals all the truth behind the perception that the world carries of the two leaders.
Now let’s forget about world view, in India itself, barring few, most intellectuals don't see him as good PM, or rather candidate. Creating a wave is just a matter of possessing money, and taking the general perception along that wave is just the result of that. But great nation is never built by person of shallow intellect. It was liberal Gandhi who gave us this great nation, not Jinna.

Why India can never be compared with Pakistan, just because we've humane quality which they dont have. India is where every person can breath not just Hindus. And, it is strongly felt that Modi is gonna make India another Pakistan. So for me Modi is inhuman. Period.

This is when Modi supporters come down to his development profile.
The shaky ground of development just to justify Modi's candidature is simply mindless. Time and again, in various reports by various agencies, it has been proved that he has supported only big industries and sold farmers' land at throwaway prices to them. And never bothered about the plight of SME's. Thousands of them have shut down.
Even if we assume that Modi would be doing development super fast and infrastructure development would be carried out as in HongKong. We all know what is happening in HongKong. You can't move around without wearing masks. Air pollution, there, is at that critical stage. Go to Vapi in Gujarat, smell the Sulfuric Acid non stop in every inch of it-in the name of development.
What we need is sustainable development and healthy environment.

Here 'Period' was meant for stopping glorification of Modi, not to stop discussion. Healthy discussion should go on.
As we counter each of their argument, they try pin-pointing the mistakes of Arving Kejriwal thinking that we, as AAPians, would defend even the mistakes.
I agree that AK should have taken more care before calling that Janta Darbar. There was a gross underestimation on his and his team's part. But he promised that the grief redressal would continue with different mode of communication. His Govt hardly survived. 49 day is less than sufficient for a Govt to judge. I don't know why you are saying his actions were doubtful. His actions, rather, establishes his credibility. With Dharna for DP he at least brought in some sense in the otherwise ruthless DP. Yes, I agree, in case of Bungalow raw he should have followed what he once preached.

Forming Govt in Delhi is what they always call a back stab then I say Arving Kejriwal is better professional than just a Old-Age-Kasam-Keeping-Fanatic. It was in the interest of Delhi to form Govt when BJP irresponsibly back tracked.
But are these issues make him ineligible to be voted when we have demons like Yeddi, Jagan, Radadia blah blah in Modi's camp. Certainly not. In this time of crisis-of-leadership, all we need is a person with good intent; be it for infrastructure development, for humanity index growth or for job creation. Just imagine, had we stopped illegal export of iron ore from Bellary region, how much new job avenues would have been created. So AK's intention to stop corruption will actually create jobs and branding his party an one-agenda-party is just senseless. But sadly India is headed towards the opposite. Only God save can us.

In an attempt to anyway maintain an upper edge for their endorsement they say it is in nations long term interest that Modi is voted to power and not Arving Kejriwal as he is a fresher in politics.
I say it is in fact in the long term interest of India that AK is voted to power else these billionaire would further become multi-billionaire and we'll keep struggling to buy even moderate 1 bed room apartment.
For instance consider the case of Kinfisher's Mallaya. Does he ever bother how many of his grounded airline employees are suffering on daily basis? No. Isn't this  a simple case of  inhumanity. Why isn't Govt questioning banks for extending him loan when his company was not making profit for straight 3 years. SBI's capital comes from our I-T. Why aren't banks recovering their money from his securities? Do you think Modi can ever take any action on them? Never. He would rather serve them with free land or for that matter with exemptions.
Good sense will only prevail when Swaraj comes into effect. Have you ever thought why in your area common amenities are in bad shape when Govt gives every MP Rs 5 Cr per year for development. It is in national interest that Swaraj comes into effect.


Saturday, April 12, 2014

Let’s not get fooled by Lion wearing wreath of grass



Construction pace of the housing project where I booked an apartment, on the outskirts of Bangalore, has drastically dropped over the last 3-4 months. However it was considerably okay initially (say during August-Sept last year). Since last 4-5 month not even one floor has completed. Presence of laborer has also been quite less.

Then, today, the front page story in TOI ( http://timesofindia.indiatimes.com/Business/India-Business/As-builders-fund-parties-homes-may-be-delayed/articleshow/33632979.cms ) caught my attention. Many builders are funding LS candidates of various parties.

The story also says the approval process of many projects have also been delayed, of late.
If we consider that our 1 vote may not play role in changing the character of the political conduct then, I think, we need to rethink.
This may be just one example how these political parties are bleeding us, you would find many such incidents in your life which are directly or indirectly impacted by these kind of nexuses.
It’s time to rethink over our decision when we just go and vote.
Vote for clean guys. 
Let’s not get fooled by the Lion wearing Wreath of Grass.

Sunday, March 30, 2014

मानव को वोट दें

आज सत्यमेव जयते का दूसरे सीज़न का पांचवा एपिसोड देखा। इस एपिसोड देखने के बाद भी अगर हम यह सोचते रहे कि परदे के आगे और पीछे के सच, ज़मीन और आसमान के मिलने जैसा होता है तो हमें रुक कर सोचने कि जरुरत है।
हमें अपने वोट के ताक़त पर बहुत ही गम्भीर हो कर सोचने कि जरुरत है। हमें बचना होगा उन ज़हरीली, साम्प्रदायिक और भ्रस्टाचारी हवाओं से जिसे आज कि घृणित राजनितिक पार्टिया हमारे ही पैसे से हमारे ही बीच फैला रही है।
इस ज़हर के हमारे जिस्म के खून तक पहुचने से हमें खुद ही रोकना होगा।
कॉंग्रेस और बीजेपी इन्ही संकुचित और ज़हरीली पार्टियों के नाम हैं।
आप यह सोचे कि 'अरे ये तो 'आप' समथक है ये तो ऐसे ही बकवास करेगा'
आप भले ही 'आप' को उचित ना समझे और वोट ना दें लेकिन अपने अधिकार का गलत प्रयोग न करें।
इन राजनितिक पार्टिओं का चरित्र भला किससे छिपा है।
मानवता का कोई विकल्प नहीं। अमानव कि कोई सफाई उचित नहीं।
मानव को वोट दें या 'NOTA' को चुने लेकिन कृपया कर के इन बलात्कारियों, हत्यारों, दम्भियों, घूसखोरों को न चुने और ना ही इन्हे सपोर्ट करने वाली पार्टियों को।  ये अहम् फैसला हमें और केवल हमें लेना है वरना अगले पांच साल तक किसी को ना कोसना है।

Tuesday, March 18, 2014

कैसे बदल गए दिन

कैसे बदल गए दिन!
आभास ही नहीं हुआ, देखते ही देखते वक़्त इतना बदल गया। अभी अभी कि बात है जब गाँव से चाचा जी का फ़ोन पड़ोस के एस टी डी बूथ के फ़ोन पर अकस्मात् ही आ जाया करता था। और दूकान वाला हमें एक बच्चे के द्वारा खबर दिया करता था। हम भी समय से काफी पहले जा कर फ़ोन आने का इंतज़ार करते थे। दुकान वाला हमसे फ़ोन सुनने या बुलाने का तय टैरिफ के मुताबिक़ चार्ज किया करता था।
अब घर में करीब पाँच फ़ोन है और कुल सदस्य हैं तीन। लेकिन ना किसी का फ़ोन आता है न किसी का इंतज़ार होता है ना किसी को फ़ोन करने का मन ही करता है।
जितने साधन उतनी कम इच्छाशक्ति।
खैर इस बारे में फिर कभी जादा ग़हराई से लिखूंगा। काफी जटिल मनोस्थिति कि उपज है ये।
८ मार्च को अपने बेटे के स्कूल के एनुअल डे सेलेब्रेसन में गया।
मैं और आरती बैठे बच्चों के कार्यक्रम देख रहे थे,(युवराज भी दो कार्यक्रमों में था) तभी जाने क्यों मन के गाडी में रिवर्स गेयर लगने लगा और पहुच गया कॉलेज के अंतिम वरसों के दिनों में।
देखते ही देखते फाइनल इयर छात्र से फ्रेशेर से सीनियर रेसौर्स से पिता से पैरेंट बन गया। मानो पर लगे हों वक़्त के पैरों में। मनःस्थिति में भी काफी बदलाव आया है। माथे के नशों में केमिकल लोचा इतने सामानांतर तरीके से होता है कि बस लगता है ज़िन्दगी इसी का नाम है।
पिताओं /अभिभावकों कि श्रेणी में खुद को पाकर काफी अज़ीब महसूस कर रहा था। भगवान  ने सोचने का मौका ही नहीं दिया जब खुद दर्शक बन कर खुद के ज़िन्दगी के बदलते दृस्य़ों को देख सकूं। लेकिन अच्छा लग रहा है। अब अपने भविष्य के साथ किसी और के भविष्य के तारों को भी जोड़ना है।
कुछ फोटोग्राफ्स साझा कर रहा हूँ।

१९-मार्च -२०१४
बैंगलोर









Thursday, March 6, 2014

अरविन्द कि गुजरात यात्रा के दौरान

जब से आम आदमी पार्टी को समर्थन देने लगा हूँ गाहे बगाहे दिन प्रतिदिन व्यथित होता रहा हूँ। लेकिन क्या है जो फिर से और जादा समर्थन करने को कहता है।  कुछ लोग कहते हैं शायद प्यार में ऐसा ही होता है। उम्र कि इस पड़ाव पर भी प्यार को न समझूं तो कहे का सफ़ेद बाल कि दुहाई देता फिरूँ।

कल बीजेपी के दफ्तर पर पथराव वाली घटना के बाद मन काफी व्यथित है। लेकिन फिर भी एक हज़ार रुपए का दान दिया पार्टी फण्ड में।
गलत को गलत कहने वाली मनःस्थिति को कहाँ लेकर जाऊं। झूठ बोलने के बाद जैसे मस्तिष्क में कहीं गाँठ पड़ जाती है।

लगता है दुविधा में हूँ कि इतने दिनों से जिसे अच्छा कहा उसे बुरा कैसे कहूँ। लेकिन दुविधा कहे का, क्या किसी दोस्त के गलती के बाद दोस्ती तोड़ दी जाती है, नहीं कदापि नहीं। सीखने कि अभिव्यक्ति जहां नहीं हो वह से पल्ला छुड़ाने या बंधे रखने कि बात होती है। और किसी ना किसी क़ातिल या मसीहे को तो चुनना ही है देश कि बागडोर सँभालने देने के लिए। वोटर आईडी कार्ड बनवाने कि अर्ज़ी भी दी है इस बार तो।
दुसरे किसी राजनीतिक पार्टी से तो कभी जुड़ाव जैसा कभी लगा ही नहीं और शायद ही लगेगा अगर आम आदमी पार्टी अस्तित्व में ना हो तो।
तभी टीवी पर न्यूज़ आया कि अरविन्द केजरीवाल ने समर्थको द्वारा कि गयी हरकतों पर जनता से माफ़ी मांगी है। चलो थोडा कोक पीने का मन कर रहा है अब। फ्रीज़ खोल कर देखा तो नदारद।
पत्नी काफी कफा रहती है कि मैं केवल अपना वक़्त जाया कर रहा हूँ इन न्यूज़ चैनलों के पीछे या ट्विटर के पीछे।  कैसे गांधी जी के भाषणों के बाद हज़ारों कि संख्या में लोग स्वतंत्रता संग्राम में कूद गए होंगे उस मनःस्थिति को जैसे सोचने को कोशीश कर रहा हूँ।  वैसे ना तो हमारा देश अंग्रेज़ों का गुलाम है और ना ही गांधी जी का पुनर्जन्म हुआ है तो भला ऐसी मनोदशा क्यों ?
देश गुलाम भले ही अंग्रेज़ों का नहीं लेकिन पूंजीपतिओं और गुंडों का तो है। क्या मुझमे हिम्मत है कि पुलिस के अत्याचार के खिलाफ कुछ बोलूं? नहीं। क्या मैं ये अपेक्षा करूँ कि पुलिस/नेता के विरुद्धः कुछ बोलू और मुझे क़ानूनी संरक्षण मिले ? नहीं। ऐसे कई सवाल होंगे और जिनका उत्तर बिना सुने ही ना में दिया जा सकता है।
क्या कोई गांधी है। किसी को भला गांधी बनने कि क्या जरुरत। गांधी जी गांधी बने तभी तो हमें गांधी बनने कि जरुरत नहीं पड़ रही। लेकिन हर दफ्तर में दरवाजे से लेकर बैकयार्ड में फैली भ्रष्टाचार से टक्कर लेने वाला कोई तो चाहिए वर्ना अमेरिका के वीसा के लिए पहले अपने टीएल और फिर एम्बसी के चक्कर में ही ज़िन्दगी बीत जायेगी। ज़िन्दगी केवल चक्कर काटने का नाम बनकर ना रह जाये। ठीक है मैं पारिवारिक ज़िम्मेदारियों सँभालने के एवज़ में शारीरिक रूप से इन आंदोलनो में हिस्सा ना ले सकूँ लेकिन जितनी आर्थिक कंट्रीब्युशन बन सके करूं।
भला तख़्त पर सदिओं से बैठा सियार, या बैठने कि आस लगाये गिद्धः कैसे आपकी गतिविधियों पर पैनी निगाह न रखें? भला कैसे अपने आँखों के सामने अपनी लोलुप जिह्वा से टपकते लार को सूखने देने कि क्रियाओं के अंकुर को भी पनपने दें ? स्वतन्त्रता ४०० सालों में मिली थी। भ्रष्टाचार कि गुलामी में जीना भी एक गुलामी ही है वक़्त तो लगेगा। भावुकताओं में गलतियां तो होंगी। सिखने के अवसर को भला क्यों जाने दें।

५ मार्च २०१४
बैंगलोर - अरविन्द कि गुजरात यात्रा के दौरान 

Friday, February 28, 2014

मेढकों से भरा एक कंटेनर

कल ऑफिस जाते वक़्त असाधारण कुछ हुआ नहीं लेकिन जाने क्यों एक लघुकथा याद करने का तुक  मिल गया।
मोटरसाइकिल पर ऑफिस या यहाँ वहाँ जाना जैसे नियति है मेरी। कई दोस्त या सहपाठी या सहकर्मी अब तक कम से कम मारुती ८०० तो जरुर खरीद लिए हैं।  मेरी जिंदगी में कुछ ऐसे अवसर आते रहते हैं कि बस ले नहीं पाता हूँ। काफी कचोटता भी है मन जब ३ साल के बेटे को मोटरसाइकिल के आगे बिठा का कहीं ले जाता हूँ और गंतव्य स्थान पर उतर कर जब बेटा अपनी आँखे मलता है। खैर यह सोच का मन को संतावना देता रहता हूँ कि सब चांदी कि चम्मच लिए पैदा नहीं होते और मेरे दिन भी बदलेंगे।  हालाँकि अब तक कुछ इसके आसार दिखे नहीं हैं।
उम्र के तीसरे दशक में हूँ और अक्सर मन से कहता रहता हूँ कि मैं परिपक्व हो चुका हूँ और अर्ध वयस्कता वाली हरकते अब मुझे शोभा नहीं देगी या मुझे करना नहीं चाहिए। फिर भी गाहे बगाहे कुछ कर ही देता  हूँ।
जब हम मोटरसाइकिल खरीदते हैं तो यह यूजर मैन्युअल में यह पढ़ते हैं कि चलाते समय स्पीड को सामानांतर रखना ईंधन कि उपयोगिता को बढ़ाता है।  यही सोच कर मैं अपनी स्पीड को ४५-५० के बीच में ही रखता हूँ। कल एक महानुभाव ने मेरे करीब से अपनी मोटरसाइकिल निकाल दी।  मानो मुझे चुनौती देता हुआ आगे बढ़ा हो।  भला मैं ऐसे अवसर में कब पीछे  हटने वाला। मैंने भी अपनी दाहिने हथेली का ज़ोर नीचे कि दिशा में बढ़ाना शुरू किया।  लेकिन यह क्या। मुझे चुनौती देने वाला शक्श आड़ी-तिरछी चाल चलने लगा ताकि मैं उससे आगे न निकल पाउँ। पीछे से आती हुई एक बड़ी गाडी ने हमारी इस अनकही प्रतिस्पर्धा को ख़त्म किया। मैं उससे आगे बढ़ा ही था कि उसका मोड़ आ गया और उसने कोई और राह पकड़ी। और मैं फिर से यूजर मैन्युअल को याद करता हुआ अपने ऑफिस कि तरफ अग्रसर हुआ।
हालांकि यह कमो-बेश  हर रोज़ कि कहानी है पर आज एक लघुकथा का स्मरण हो गया।
ऐसा माना जाता है कि चीन वाले मेढक का मांस खाते हैं. भारत से मेढकों से भरा एक कंटेनर जल जहाज से चीन कि ओर जा रहा था। चीन के बन्दरगाह पर जब जहाज पहुंचा और परेषिती ने माल जांच करने के इरादे से कंटेनर को ऊपर से झांका तो पाया कि कंटेनर का ढक्कन खुला हुआ हैं। उसने तुरंत ही भारत, अपने प्रेषक को, फ़ोन लगाया और पूछा कि ढक्कन खुला क्यों रखा। प्रेषक से खेद जताते हुए यह कहा कि "जनाब ये भारत के मेढक हैं अगर कोई भागने कि
कोशिश भी कर रहा होगा तो दूसरा उसकी टांग खीच रहा होगा और इस तरह मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कोई नहीं भागा (या समुद्र में कूदा होगा  होगा।  पावक का मन नहीं माना और उसने गिनती करी शुरू कर दी और पाया कि सही मायने में एक भी मेढक भाग नहीं पाया।
यह कहानी सुनने में काफी साधारण सी लगती है लेकिन यह भारतियों कि विस्तृत मानसिकता का परिचय देती है। भले ही हम अपनी झूठी गौरव का हवाला देते हुए इसे झुठला दें लेकिन करीब करीब हर एक व्यवसायी या नौकरी पेशा इस तरह कि अनुभव से कम से कम एक बार तो वाकिफ होता ही हैं।(मैं ऐसा कदापि नहीं कह रहा कि दुसरे देशों में लोग ऐसा नहीं करते होंगे)

(साभार : कहीं किसी ब्लॉग में पढ़ा था, कहाँ याद नहीं )
२८ फरबरी २०१४

Wednesday, February 26, 2014

स्वैच्छिक निष्क्रिय इच्छामृत्यु

कई लोग अपनी ज़िन्दगी में रोज़ मरते हैं। लेकिन उनमे इतनी या तो इच्छाशक्ति नहीं होती है कि अपनी जान खुद ले सकें या शारीरिक रूप से इतनी अक्षम होते हैं कि ऐसा कर नहीं सकते। मूल रूप में देंखें तो तीन तरह के ऐसे लोग होते हैं पहला - बेहद बोझिल, वेदना से पूर्ण,  इच्छाशक्ति के निम्नतर सतह पर लेकिन किसी तरह जिंदगी कि नाव खेते लोग। ये यह चाहते हैं या तो भूकम्प आ जाये या जिस रेल से ये चलें वो उलट जाये या ऐसा ही कुछ हो जाये जब इन्हे पता न चले और ये रेलमपेल कि ज़िन्दगी से निकल मोक्ष पा सकें। लेकिन ये खुद से आत्महत्या नहीं कर सकते। दुसरे वो लोग हैं जो पहली वाली श्रेणी में आंशिक रूप हैं इच्छाशक्ति भी है लेकिन पारिवारिक दवाब इतनी है कि कुछ नहीं कर सकते और जिंदगी को जैसी है वैसी जी रहे हैं।  तीसरे वो लोग हैं जिन्हे जीने के लिए कुछ बचा नहीं है।  जो दूसरों पर बोझ हैं। और इस वजह से खुद से आहात भी हैं अंततः मरना चाहते हैं लेकिन उनके सगे उन्हें मरने नहीं देते। जबकि उनकी शारीरिक पीड़ा इतनी है कि जीने को कोई तमन्ना शेष नहीं।
इस तीसरे किस्म के लोगो के लिए है "स्वैच्छिक निष्क्रिय इच्छामृत्यु"। यानि "एक व्यक्ति के स्पष्ट अनुरोध पर किसी अन्य के द्वारा जीवन की जानबूझकर समाप्ति कि इच्छा" हमने राईट टू एडुकेशन, राईट टू हेल्थ, राईट टू जस्टिस इत्यादि सुना है लेकिन राईट टू डेथ के बारे में कभी सोचा नहीं। 
वे जिनकी जिंदगी उनके खुद के लिए मौत से भी बदतर, जो मौत को गले लगाने के लिए बेचैन, और जिनकी जिंदगी किसी और के लिए मानसिक/आर्थिक पीड़ा पहुचने वाली हो को भला क्यों नहीं उनकी इच्छा के अधीन कर दिया जाये। व्यवहारिक होकर न सोचें तो अमानवीय लगता है। 
मेरे विचार से यह उनके चाहने वालों के लिए भी बेहतर उपाय है जो रोज़ ऊन्हे कराहते सुनते या देखते हैं। 
आज सर्वोच्च न्यायालय ने इसको क़ानूनी बनाने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए वक़्त माँगा। जाहिर है ऐसी किसी याचिका पर किसी तरह के हाँ या ना तरह के आदेश का सुना पाना उनके लिए काफी मुस्किल है। 
क्यों ना न्यायालयही ऐसी किसी कमिटी का गठन करे जिसने तमाम तरह के शिक्षाविद, सामाजिक/धार्मिक प्रतिनिधि, वकील, मानवाधिकार संस्था से जुड़े लोग हों और एक उच्चस्तरीय वार्तालाप हो। 
जिस तरह कि जिंदगी के तरफ हम दिन प्रतिदिन बढ़ रहे हैं इस तरह के मरीजों कि संख्या के बढ़ने कि ही सम्भावना है। स्वाथ्य संस्थानों के सेवाओं कि बढ़ती कीमतें, बढ़ता प्रदुषण, कृत्रिम जिंदगी कि बढ़ती लालसा ऐसी बाते हैं जो हमारे लक्ष्यों में शुमार हो चुके हैं। 
वे जिनकी भगवान् सुनना बंद कर दें, डॉक्टर जहां असहाय हो उनके बारे में कुछ तो सोचना ही होगा। 

Wednesday, February 19, 2014

अच्छा हो हम इस सवाल को सवाल ही रहने दें।

अक्सर देखा गया है लोग केवल अपने ही धर्म को बेहतर समझते हैं। दुसरे धर्म को बराबर या अच्छा नहीं बल्कि निहायत ही घटिया समझते हैं। ये हमारा अतिरिक्त मिथ्या स्वयं के अतिचतुर या अतिविशिष्ट होने का घमंड ही है जो हमें दूसरों के धर्म में नीचा दिखाने के लिए प्रेरित करता रहता है। भला ऐसी क्या बात है किसी के धर्म में जो  उसे दुसरे धर्म को मानने वाले लोगो के प्रति घृणा पैदा करता है। जितना मुझे अब तक अनुभव या ज्ञान प्राप्त हुआ है उसके अनुसार कोई भी धर्म हिंसा या घृणा नहीं सिखाता है। फिर भला अपने धर्म को दूसरों को मनवाने कि इतनी चाह क्यों।
चलिए एक छोटा सा सवाल हम खुद से करते हैं। अगर "X" हिंदू है और वो दिन भर मुस्लिम के अल्लाह को या ईसाई के ईसू मसीह को गाली देता रहता है या वो सूअर का मांस खाता है।  उसे कुछ भी नहीं होता है।
"Y" मुस्लिम है वह दिन भर हिंदुओं के विभिन्न भगवान को और ईसाई के ईसू मसीह को गाली देता रहता है या बैल का मांस खाता है।  उसे कुछ भी नहीं होता है।
"Z" ईसाई है वह सदैव हिंदू, मुस्लिम के मान्यताओं पर हँसता रहता है अपशब्द कहता है या सुअर या बैल का मांस खाता है उसे भी कुछ नहीं होता है।
यानि कि एक भगवान का दुसरे भगवान से किसी प्रकार का संवाद नहीं होता है या "Y" "X" के भक्तों का बाल बांका नहीं कर सकता है।  उसी प्रकार "Z" "Y" के भक्तों का बाल बांका नहीं कर सकता है। सुनने में काफी अज़ीब लगता है ना?
सारे धर्मग्रन्थ यह कहते हैं कि भगवान एक ही है। हमारा यह सवाल इस तथ्य को तो गलत साबित कर रहा है।
या हम यह भी मान सकते हैं कि भगवान है ही नहीं और हम किसी प्रकार के मिथ्या सिद्धांतों के सहारे जी रहे हैं।
अच्छा  हो हम इस सवाल को सवाल ही रहने दें।
अब, सारे भगवान एक हैं इस तथ्य पर भी थोडा गौर करते हैं। इस एक-भगवान प्यार नाम के एक चीज़ का निर्माण किया। यह कम से कम हर धर्म में माना जाता है।  एक हिन्दू लड़के को मुस्लिम लड़की से प्यार हो जाता है या एक ईसाई लड़के को हिन्दू लड़की से प्यार हो जाता है।  ये लोग भी बचपन से  अपने अपने धर्मो के रूढीवादों को देखते आते हैं।  लेकिन प्यार हो जाने के बाद जैसे हर एक कर्म काण्ड मित्थ्या लगने लगती है।  क्यों ? दिल में किसी के प्रति प्यार का भर जाना को किसी एक प्रक्रिया के तहत ही होता होगा। अगर यह माने कि इस अनुभूति को भगवान अपने भक्तों के सृजन के वक़्त उसके ज़िस्म में डालते हैं तो विभिन्न जीवों में या अनुभूति एक जैसी क्यों ? कहीं इस अनुभूति वाला रसायन किसी एक ने ही तो नहीं बनाया। कहीं सारे भगवान एक तो नहीं ?
अगर एक नहीं तो सबके ज़िस्म के खून का रंग लाल ही क्यों ? मुस्लिम का नीला, हिन्दू का पीला और ईसाई का गुलाबी क्यों नहीं?
और अगर एक ही है तो किसी के मन में सबके लिए प्यार और किसी के मन में दूसरों के खून पिने कि इच्छा क्यों ?
गुत्थियों में गुत्थी और जलेबी सी उलझन। अच्छा हो हम इस सवाल को सवाल ही रहने दें।


(यहाँ जिन तथ्यों का विवरण है उसकी प्रेरणा एक अंग्रेजी फ़िल्म "The Vertical Limit" से ली गयी है )



Sunday, February 16, 2014

Hue and Cry on Natural Gas Pricing



There is lots of hue and cry on natural gas pricing these days -
If we try to understand it in simple terms, and forget Rangarajan Committee and their nuances for a while - without prejudice, India shouldn't pay International price for gases from its own Oil wells. Reliance is given the contract for getting gas out of oil wells and processing it.
When India pays 12$ per mmBtu or so to foreign gas suppliers, it actually pays for the "gas". This means this 12$ for them is Gas Cost price + Processing cost + Their Profit::Per unit. The same doesn't hold true for Reliance. Gas is of Govt not Reliance's, and they are only supposed to be paid for the processing cost plus their profit, not the international price that Rangarajan committee recommends. Paying International price to Reliance would only mean that Reliance is the owner of gas, which they are not. Processing fee for Reliance, according to their own submission, is just $1 per unit. One can't be given 700% profit.
If India needs to pay international price for gas from its own wells then what is the point in owning them.
It is like I want a well in my field(for water) and I give a well digger the contract but the digger starts charging me for the water including its labor charge.
C Rangarajan is not God that whatever his team suggest should be the final word.
 

Thursday, February 13, 2014

मेरा मत, मेरा दिल


हम आये दिन अपने नेताओं कि  बुराई करते रहते हैं।  जो मर्ज़ी वो कहते हैं।  लकीर के उस तरफ से दूसरी तरफ के बारे को कुछ भी कहना  हर वक़्त आसान होता है।  आज मुझे कबीर  जी का दोहा याद आ रहा है -

बुरा जो देखना मैं चला, बुरा ना मिलिया कोई।
जो दिल ढूंढा अपना , मुझ  सा बुरा न कोई।।

यह् हमारी पुरानी आदत है, सदैव दूसरों में अवगुण  ढूंढना।  हम कभी अपनी करणी नहीं देखते।  कभी नहीं सोचते आज जो  हम  कर रहे हैं  इसका  दूरगामी  असर क्या होगा।

अक्सर मैंने  अपने दोस्तों को , अपने पड़ोसियों को हर तरह के चुनाओ से पहले प्रत्याशियों  के बारे में बाते करते सुना है।  उन चर्चाओं में कभी भी किसी व्यक्ति के चरित्र या उसके पिछली आचरण को या उसके क्षमता के बारे में बात नहीं करते हैं।  अक्सर उसके आने या ना आने से हमारा क्या फायदा होगा ये सोचते हैं वो किस जाति का वो किस धर्म का है उससे हमारे कितने घनिष्ट सम्बन्ध है इस बारे में बातें होती हैं।

आज  कल सदन में बढ़ती सांसदों द्वारा कि जाने वाली  असवैधानिक व्यवहारों का बढ़ता चलन इस बात को साफ़ इंगित  करता है कि हम मतदाताओं का बौद्धिक स्तर सोच से परे गिर गया है।

क्या ऐसा कहा जा सकता है कि  शिक्षा कि कमी इसका कारण है।  आप कह सकते हैं हां। लेकिन मैं इसे कुछ हद तक ही कारक मानूंगा। मैं अपनी इस दलील को सिद्ध करने के लिए एक वाक्या पेश करता हूँ।

तब मैं पटना साईंस कॉलेज में स्नातक कि पढ़ाई कर रहा था। मेरी बी एस सी के भौतिक शास्त्र के लैब का क्लास था और मैं अपने एक साथी के साथ एक प्रयोग में व्यस्त था।  तभी हमें थोड़ी सहायता कि जरूरत आन पड़ी और हम लोग लैब अटेंडेंट के पास गए। वो हमारे डेस्क पर आते के साथ ही थोड़ी बहुत बातचीत के बाद हमारी जाति के बारे में पूछा तो हमने भी सीधा सा जवाब दे दिया कि हम बैकवर्ड कास्ट से आते हैं ताकि बात और ना  बढे और हम अपने प्रयोग को ख़त्म कर हॉस्टल वापस जाएँ।  इस बात पर उसने कहा - हाँ आज काल तो कोई भी कास्ट वाला पढ़ने लगा है।  हमें बुरा तो लगा लेकिन हम हर वक़्त झगडने लगते नहीं हैं।  लड़ तो लें लेकिन मानसिकता कहाँ बदलें।

यह २००० साल कि बात  है।  इस वाक्या से  एक बात एक बात साफ़ हो जाती है कि पढ़े लिखे होने के बाद भी काफी हद तक लोगो कि मानसिकताएं नहीं बदलती हैं।

मेरे विचार से इस तरह कि रूढ़िवादी विचारधारा तभी बदलेगी जब हम अपने कुएं से बाहर निकलेंगे।  विदेश भ्रमण करेंगे। अपने आप तो थोपने कि जगह दूसरों को सुनेंगे भी। अन्तर्जाती विवाह को ज्यादा से ज्यादा होने देंगे। अन्तर्जाती ही क्यों विभिन्न धर्मों  में भी विवाह को स्वीकार करेंगे और मानवता के दुश्मनो को बिना उसके पहचान के सज़ा देंगे।  मानवता के दुश्मनों का बहिष्कार करेंगे।  और सबसे अधिक जरूरी कि मन कि ईमानदारी को सुनेंगे।

धार्मिक संस्थाओं बैठे मूड व्यक्तिओं को  एक सिरे से खारिज़ करने कि जरूरत है। और सबसे बढ़कर लोगो को अपने धर्म से परे , जाति से परे, हर तरह के विवादों से परे देश को ध्यान में रख कर अपने मत के बारे में सोचना होगा।

Sunday, February 2, 2014

बदलेगा देश।

१९७५ में बिहार आंदोलन को राष्ट्रीय भ्रष्टाचार आंदोलन में हरियाणा में तब्दील किया गया था। आज भी एक हरियाणा का वीर उन्ही राहो पर फिर से चल पड़ा है।
एक वो वक़्त था जब प्रधान मंत्री को भी कटघरे में आना  पड़ा एक ये वक़्त है जब सीबीआई को तोता कहा जाता है और भ्रष्टाचारियों को भ्रष्टाचारी कहने पर मानहानी कि धमकी दी जाती है।

कुछ हो न हो कम से कम इतना जरुर होगा अबकी, कि हर एक तथाकथित वरिष्ट नेताओं को एक एक वोट के लिए मन्नते मांगनी होगी।
बदलेगा देश।

मेट्रो बंद हो गयी

हैरत होता है मुझे यह देख कर कि हम वही लोग हैं जो दशकों से चुप्पी साधे, बैठे , हर भ्रष्टाचार और राष्ट्रीय सम्पदा के लूट का तमाशबीन बने रहे। तक़दीर और वक़्त को जिम्मेदार कहते रहे, आज ३६ घंटे के लिए मेट्रो क्या बंद हो गयी एक राष्ट्र के लिए लड़ने वाले को अराजक और गैरजिम्मेदार कहने में  एक क्षण भी  नहीं  लगाये। सैकड़ों विधायकों के लिए रोकी गयी ट्राफिक का हिस्सा बनते हुए कभी ऐसी तकलीफ जिन्हे नहीं हुई उन्ही को स्थापित राह बदल कर दूसरी राह भर पकड़ कर जाने में इतनी तकलीफ हुई कि अमानवीयता का शिकार हुई , अपने ही घर में जलाई गयी महिला के हृदयविदारक  जलन को भूल गए।
स्वार्थ में जीने और राहों कि एक ही ढर्रे से चलने वाले वक़्त कि सुई को थमना होगा।
अब और नहीं।
इतना आसान नहीं है लेकिन बदलेगा देश।

शेखर कपूर के ट्विटर पर

आशाओं कि गर्म हवा उनकी पक्की दीवारें, बंद दरवाज़ो और ठन्डे दफ्तरों तक कैसे पहुंचे। बेहतर है सरकार सड़कों पे बैठे। जनता का शोर तो सुन सकें Via Shekhar Kapur on Twitter.

सोचने लगता हूँ - क्या भावनायें शासन के साथ कदम मिलाकर चल सकतीं हैं ? पता नहीं। जन्म से - राजनीती बुरी बला - का नारा सुनते आया हूँ। इतिहास में राजनीति के नाम पर लोगो कि हत्यायों कि मार्मिक और हृदयविदारक कथाये सुनी हैं। शासन के नाम पर ऊँची ऊँची कुर्सियों पर लगे नगमे देखे हैं , लाव लश्कर देखे हैं , निजता के भाव देखे हैं। दायें बाएं झाकता हूँ तो कोई नहीं दीखता इनको साथ में लेकर चलने वाला।
लेकिन दीपक जलाने कि कोशिश की है किसी ने।