ये इंटीरियर डिज़ाइन वाले साधारण से साधारण चीजों को दीवारों पर इस क़दर टांग देते हैं की अच्छा ही लगता है।
आज हमारे टीम लीडर सत्या ने 'पीज़ा हट' में, अमेरिका जाने की ख़ुशी में, पूरे टीम को दावत दी।
वहीं देखा - प्लास्टिक के पारदर्शी परातों को काले रंग से रंग कर सतह पर कोई चित्र आंका गया हो और फिर पीछे प्रचलित एल-ई-डी वाले बल्ब्स लगा कर दीवारों पर टांगा गया हो।
चमकने वाली कागज के प्लेटों पर कुछ और रंगीन कागज़ और रूई लगा कर जब भाभी कोई सजावट की चीजें बनातीं थीं तो मन में सोचा करता था - भला भाभी क्यों इन सब चीजों में अपना समय बरबाद करतीं हैं।
आज उसी प्रकार के सजावट के बनावटों को इन मॉलों के दीवारों पर देखता हूँ तो उस इंटीरियर डिज़ाइनर के बारे में सोचने लगता हूँ की - इन साधारण सी बनावटों के लिए उसने कितने पैसे लिए होंगे।
खैर यह तो हुई रेस्त्रां की सजावट बारे में। वहीँ बैठे बैठे सोचने लगा वहाँ काम करने वाले कर्मचारी, जो ग्राहक से आर्डर लेते और सर्व करते समय सीखे हुए विभिन्न तरह से इटालियन शब्दों का इस्तमाल करते हैं , इनके रहन सहन, घरेलु बोलचाल या इनके विचार में कितना फर्क आया होगा, यहाँ काम करते हुए।
क्योंकि जब थोड़ा ध्यान से देखता हूँ तो इन होम डिलीवरी करने वालों के ड्रेस के अंदर के कमीज मैले ही होते हैं , ये जो कमर में बेल्ट पहनते हैं वही इनके पैंट को इनके कमर से बंधे रखने का बीड़ा उठाते हैं. ये पिज़ा हट वाले अपने कर्मचारियों को बिना नाप के पैंट पहनाकर ऊपर से एक ओवरकोर्ट से ढंकवाकर अच्छी दिखावट तो कर देते हैं लेकिन उनके जीवन में कितना बदलाव लाते हैं - पता नहीं।
अपने गाँव बेगुसराय में शादियों में बैंड बाजे वालों की टोली में मास्टर छोड़कर शायद की किसी का ड्रेस ढंग से बना हुआ होता है। चाहे बेगुसराय की क्रक धूम वालों की टीम हो या बैंगलोर के पिज़ा हट वालों के डिलीवरी की टीम - पीसने वाले वही हैं।
सत्या ने करीब ८००० खर्च किये।
आज २६ जुलाई २०१४ को हमारे अमेरिकी ऑफिस के मैनेजर में हमारे काम से खुश होकर हमें पार्टी देने का वादा किया। इन्हे भी करीब करीब ८००० खर्च तो करना ही पड़ेगा अगर हम अपनी टीम मेम्बरों की सँख्या और आज की महँगाई को मद्देनज़र लाएँ तो।
इन दोनों मौको पर अगर हम इन्ही रुपयों से, जो की १६००० के करीब होगी, कॉपियां खरीद कर सरकारी स्कूलों के बच्चों को बाँट दिए होते - कितनी मुस्कराहटें हमने खरीदी होती।
मैं केवल सोचता रह जाता हूँ।
आज हमारे टीम लीडर सत्या ने 'पीज़ा हट' में, अमेरिका जाने की ख़ुशी में, पूरे टीम को दावत दी।
वहीं देखा - प्लास्टिक के पारदर्शी परातों को काले रंग से रंग कर सतह पर कोई चित्र आंका गया हो और फिर पीछे प्रचलित एल-ई-डी वाले बल्ब्स लगा कर दीवारों पर टांगा गया हो।
चमकने वाली कागज के प्लेटों पर कुछ और रंगीन कागज़ और रूई लगा कर जब भाभी कोई सजावट की चीजें बनातीं थीं तो मन में सोचा करता था - भला भाभी क्यों इन सब चीजों में अपना समय बरबाद करतीं हैं।
आज उसी प्रकार के सजावट के बनावटों को इन मॉलों के दीवारों पर देखता हूँ तो उस इंटीरियर डिज़ाइनर के बारे में सोचने लगता हूँ की - इन साधारण सी बनावटों के लिए उसने कितने पैसे लिए होंगे।
खैर यह तो हुई रेस्त्रां की सजावट बारे में। वहीँ बैठे बैठे सोचने लगा वहाँ काम करने वाले कर्मचारी, जो ग्राहक से आर्डर लेते और सर्व करते समय सीखे हुए विभिन्न तरह से इटालियन शब्दों का इस्तमाल करते हैं , इनके रहन सहन, घरेलु बोलचाल या इनके विचार में कितना फर्क आया होगा, यहाँ काम करते हुए।
क्योंकि जब थोड़ा ध्यान से देखता हूँ तो इन होम डिलीवरी करने वालों के ड्रेस के अंदर के कमीज मैले ही होते हैं , ये जो कमर में बेल्ट पहनते हैं वही इनके पैंट को इनके कमर से बंधे रखने का बीड़ा उठाते हैं. ये पिज़ा हट वाले अपने कर्मचारियों को बिना नाप के पैंट पहनाकर ऊपर से एक ओवरकोर्ट से ढंकवाकर अच्छी दिखावट तो कर देते हैं लेकिन उनके जीवन में कितना बदलाव लाते हैं - पता नहीं।
अपने गाँव बेगुसराय में शादियों में बैंड बाजे वालों की टोली में मास्टर छोड़कर शायद की किसी का ड्रेस ढंग से बना हुआ होता है। चाहे बेगुसराय की क्रक धूम वालों की टीम हो या बैंगलोर के पिज़ा हट वालों के डिलीवरी की टीम - पीसने वाले वही हैं।
सत्या ने करीब ८००० खर्च किये।
आज २६ जुलाई २०१४ को हमारे अमेरिकी ऑफिस के मैनेजर में हमारे काम से खुश होकर हमें पार्टी देने का वादा किया। इन्हे भी करीब करीब ८००० खर्च तो करना ही पड़ेगा अगर हम अपनी टीम मेम्बरों की सँख्या और आज की महँगाई को मद्देनज़र लाएँ तो।
इन दोनों मौको पर अगर हम इन्ही रुपयों से, जो की १६००० के करीब होगी, कॉपियां खरीद कर सरकारी स्कूलों के बच्चों को बाँट दिए होते - कितनी मुस्कराहटें हमने खरीदी होती।
मैं केवल सोचता रह जाता हूँ।
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