Tuesday, August 12, 2014

मैं चौकीदार हूँ

मैं चौकीदार हूँ और मैंने अपने ऑफिस में ऊँचे कर तख़्त लगाये हैं. मैं उस पर बैठता हूँ  बाकी नीचे बैठते हैं ताकि मैं सबकी आँखों में देख सकूँ (घूर सकूँ).

मैंने लोकतंत्र को नया नाम दिया है। जिसमे लोकतान्त्रिक अधिकार के तहत लोग केवल मुझे अपनी व्यथा, सलाह, और इच्छाएं सुनाते हैं। मैं सुनने का नाटक करता हूँ।  करता अपने मन की हूँ।  करवाता अपने मन की हूँ।
नौकर की तरह लोगो को अपने सामने खड़े रखता हूँ।  सलाम न ठोकने वाले को किसी न किसी तरीके से ठोक देता हूँ
मैं एक चौकीदार हूँ। मैं हूँ। बस।
न कोई है, न किसी  की औकात हैं, और ना किसी की औकात मैं बनने दूंगा।

मेरे चारो तरफ सुरक्षा कर्मी तैनात रहते हैं। अमरों की तरह, अमीरों की निजी वायुयानों में सफर करता हूँ।

गरीबो से सायद ही मेरा कोई सरोकार है। मेरे सामने या मेरे दोस्तों से सामने उड़ने वालों के मैं  पर क़तर देता हूँ।
मैं एक चौकीदार हूँ। मैं हूँ। बस।

मेरा कोई धर्म नहीं है। मुझपे पैसे लगाने वाले मुझे धर्म की परिभाषा बताते हैं। विकास करना मेरा काम हैं -यह मैं सुनाता हूँ। लेकिन इसके नाम पर मैं सार्वजनिक संपत्ति अपने दोस्तों को सौंप देता हूँ।

मुझे मेरी ज़ी हुज़ूरी करने वाले ही पसंद हैं।

मेरा कोई धर्म नहीं है। मैं चौकीदार हूँ। मैं खून पिता हूँ यदा कदा।

मुझे सायद ही अंग्रेजी आती है लेकिन मैं धाराप्रवाह अंग्रेजी में ट्वीट करता हूँ , फेसबुक के पोस्ट्स भी मेरे अंग्रेजी में ही रहते हैं।  सरकारी संपत्ति का प्रयोग मैं अपने प्रचार प्रसार के लिए लगाता हूँ।

मेरा ना कोई अपना हैं।  मुझपर पैसा लगाने वाले, मेरी महत्वाकांक्षा में मेरा सहयोग करने वाले मुझसे फलीभूत होते हैं और वही मेरे अपने हैं।

मैं एक चौकीदार हूँ


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