Thursday, March 6, 2014

अरविन्द कि गुजरात यात्रा के दौरान

जब से आम आदमी पार्टी को समर्थन देने लगा हूँ गाहे बगाहे दिन प्रतिदिन व्यथित होता रहा हूँ। लेकिन क्या है जो फिर से और जादा समर्थन करने को कहता है।  कुछ लोग कहते हैं शायद प्यार में ऐसा ही होता है। उम्र कि इस पड़ाव पर भी प्यार को न समझूं तो कहे का सफ़ेद बाल कि दुहाई देता फिरूँ।

कल बीजेपी के दफ्तर पर पथराव वाली घटना के बाद मन काफी व्यथित है। लेकिन फिर भी एक हज़ार रुपए का दान दिया पार्टी फण्ड में।
गलत को गलत कहने वाली मनःस्थिति को कहाँ लेकर जाऊं। झूठ बोलने के बाद जैसे मस्तिष्क में कहीं गाँठ पड़ जाती है।

लगता है दुविधा में हूँ कि इतने दिनों से जिसे अच्छा कहा उसे बुरा कैसे कहूँ। लेकिन दुविधा कहे का, क्या किसी दोस्त के गलती के बाद दोस्ती तोड़ दी जाती है, नहीं कदापि नहीं। सीखने कि अभिव्यक्ति जहां नहीं हो वह से पल्ला छुड़ाने या बंधे रखने कि बात होती है। और किसी ना किसी क़ातिल या मसीहे को तो चुनना ही है देश कि बागडोर सँभालने देने के लिए। वोटर आईडी कार्ड बनवाने कि अर्ज़ी भी दी है इस बार तो।
दुसरे किसी राजनीतिक पार्टी से तो कभी जुड़ाव जैसा कभी लगा ही नहीं और शायद ही लगेगा अगर आम आदमी पार्टी अस्तित्व में ना हो तो।
तभी टीवी पर न्यूज़ आया कि अरविन्द केजरीवाल ने समर्थको द्वारा कि गयी हरकतों पर जनता से माफ़ी मांगी है। चलो थोडा कोक पीने का मन कर रहा है अब। फ्रीज़ खोल कर देखा तो नदारद।
पत्नी काफी कफा रहती है कि मैं केवल अपना वक़्त जाया कर रहा हूँ इन न्यूज़ चैनलों के पीछे या ट्विटर के पीछे।  कैसे गांधी जी के भाषणों के बाद हज़ारों कि संख्या में लोग स्वतंत्रता संग्राम में कूद गए होंगे उस मनःस्थिति को जैसे सोचने को कोशीश कर रहा हूँ।  वैसे ना तो हमारा देश अंग्रेज़ों का गुलाम है और ना ही गांधी जी का पुनर्जन्म हुआ है तो भला ऐसी मनोदशा क्यों ?
देश गुलाम भले ही अंग्रेज़ों का नहीं लेकिन पूंजीपतिओं और गुंडों का तो है। क्या मुझमे हिम्मत है कि पुलिस के अत्याचार के खिलाफ कुछ बोलूं? नहीं। क्या मैं ये अपेक्षा करूँ कि पुलिस/नेता के विरुद्धः कुछ बोलू और मुझे क़ानूनी संरक्षण मिले ? नहीं। ऐसे कई सवाल होंगे और जिनका उत्तर बिना सुने ही ना में दिया जा सकता है।
क्या कोई गांधी है। किसी को भला गांधी बनने कि क्या जरुरत। गांधी जी गांधी बने तभी तो हमें गांधी बनने कि जरुरत नहीं पड़ रही। लेकिन हर दफ्तर में दरवाजे से लेकर बैकयार्ड में फैली भ्रष्टाचार से टक्कर लेने वाला कोई तो चाहिए वर्ना अमेरिका के वीसा के लिए पहले अपने टीएल और फिर एम्बसी के चक्कर में ही ज़िन्दगी बीत जायेगी। ज़िन्दगी केवल चक्कर काटने का नाम बनकर ना रह जाये। ठीक है मैं पारिवारिक ज़िम्मेदारियों सँभालने के एवज़ में शारीरिक रूप से इन आंदोलनो में हिस्सा ना ले सकूँ लेकिन जितनी आर्थिक कंट्रीब्युशन बन सके करूं।
भला तख़्त पर सदिओं से बैठा सियार, या बैठने कि आस लगाये गिद्धः कैसे आपकी गतिविधियों पर पैनी निगाह न रखें? भला कैसे अपने आँखों के सामने अपनी लोलुप जिह्वा से टपकते लार को सूखने देने कि क्रियाओं के अंकुर को भी पनपने दें ? स्वतन्त्रता ४०० सालों में मिली थी। भ्रष्टाचार कि गुलामी में जीना भी एक गुलामी ही है वक़्त तो लगेगा। भावुकताओं में गलतियां तो होंगी। सिखने के अवसर को भला क्यों जाने दें।

५ मार्च २०१४
बैंगलोर - अरविन्द कि गुजरात यात्रा के दौरान 

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