Tuesday, March 18, 2014

कैसे बदल गए दिन

कैसे बदल गए दिन!
आभास ही नहीं हुआ, देखते ही देखते वक़्त इतना बदल गया। अभी अभी कि बात है जब गाँव से चाचा जी का फ़ोन पड़ोस के एस टी डी बूथ के फ़ोन पर अकस्मात् ही आ जाया करता था। और दूकान वाला हमें एक बच्चे के द्वारा खबर दिया करता था। हम भी समय से काफी पहले जा कर फ़ोन आने का इंतज़ार करते थे। दुकान वाला हमसे फ़ोन सुनने या बुलाने का तय टैरिफ के मुताबिक़ चार्ज किया करता था।
अब घर में करीब पाँच फ़ोन है और कुल सदस्य हैं तीन। लेकिन ना किसी का फ़ोन आता है न किसी का इंतज़ार होता है ना किसी को फ़ोन करने का मन ही करता है।
जितने साधन उतनी कम इच्छाशक्ति।
खैर इस बारे में फिर कभी जादा ग़हराई से लिखूंगा। काफी जटिल मनोस्थिति कि उपज है ये।
८ मार्च को अपने बेटे के स्कूल के एनुअल डे सेलेब्रेसन में गया।
मैं और आरती बैठे बच्चों के कार्यक्रम देख रहे थे,(युवराज भी दो कार्यक्रमों में था) तभी जाने क्यों मन के गाडी में रिवर्स गेयर लगने लगा और पहुच गया कॉलेज के अंतिम वरसों के दिनों में।
देखते ही देखते फाइनल इयर छात्र से फ्रेशेर से सीनियर रेसौर्स से पिता से पैरेंट बन गया। मानो पर लगे हों वक़्त के पैरों में। मनःस्थिति में भी काफी बदलाव आया है। माथे के नशों में केमिकल लोचा इतने सामानांतर तरीके से होता है कि बस लगता है ज़िन्दगी इसी का नाम है।
पिताओं /अभिभावकों कि श्रेणी में खुद को पाकर काफी अज़ीब महसूस कर रहा था। भगवान  ने सोचने का मौका ही नहीं दिया जब खुद दर्शक बन कर खुद के ज़िन्दगी के बदलते दृस्य़ों को देख सकूं। लेकिन अच्छा लग रहा है। अब अपने भविष्य के साथ किसी और के भविष्य के तारों को भी जोड़ना है।
कुछ फोटोग्राफ्स साझा कर रहा हूँ।

१९-मार्च -२०१४
बैंगलोर









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