हैरत होता है मुझे यह देख कर कि हम वही लोग हैं जो दशकों से चुप्पी साधे, बैठे , हर भ्रष्टाचार और राष्ट्रीय सम्पदा के लूट का तमाशबीन बने रहे। तक़दीर और वक़्त को जिम्मेदार कहते रहे, आज ३६ घंटे के लिए मेट्रो क्या बंद हो गयी एक राष्ट्र के लिए लड़ने वाले को अराजक और गैरजिम्मेदार कहने में एक क्षण भी नहीं लगाये। सैकड़ों विधायकों के लिए रोकी गयी ट्राफिक का हिस्सा बनते हुए कभी ऐसी तकलीफ जिन्हे नहीं हुई उन्ही को स्थापित राह बदल कर दूसरी राह भर पकड़ कर जाने में इतनी तकलीफ हुई कि अमानवीयता का शिकार हुई , अपने ही घर में जलाई गयी महिला के हृदयविदारक जलन को भूल गए।
स्वार्थ में जीने और राहों कि एक ही ढर्रे से चलने वाले वक़्त कि सुई को थमना होगा।
अब और नहीं।
इतना आसान नहीं है लेकिन बदलेगा देश।
स्वार्थ में जीने और राहों कि एक ही ढर्रे से चलने वाले वक़्त कि सुई को थमना होगा।
अब और नहीं।
इतना आसान नहीं है लेकिन बदलेगा देश।

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