Sunday, May 5, 2013

मेरे घर में आईना नहीं है|

मेरे घर में आईना नहीं है,
दीवारों में निकल आई दरख्तों से झांकते लोग,
मेरे चेहरे पर निकल आई झुर्रियों का पता देते हैं।

मेरे घर में घड़ी नहीं है,
चौराहे पे गाड़ियों के लगे तांते,
ऐ.सी. कार में बैठे निरंतर हॉर्न देते, बेताब होते लोग,
और नुक्कड़ पर झुग्गी शराबखाने में बढती भीड़,
दिन के चढ़ आने और उतर जाने का पता देते हैं।

कभी, पडोसी की बीवी के रूठ कर मायके चले जाने के बाद-
उन के बच्चे मेरे ही घर पर दिन बिताया करते थे।
आज, बच्चों को गोद में उठाने पर भी लोगो की शक भरी निगाहें
हमारे अन्दर उबल कर आ गयी हैवानियत का पता देतीं हैं ।

जाने कब थमेगी,
मशीनों से बढती मित्रता और इंसानों का व्यापार।
आँखों में बढ़ आई लाली का सड़कों पे बिखरी खून में तबदीली का सिलसिला
एक प्रलय के जल्द ही आने का पता देती है।


Raj Kumar Pandit
05-May-2013
,Bangalore

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